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जनजागरूकता और कलाकारों की मेहनत से बदली तस्वीर, 10 साल में गणेश प्रतिमाएं हुईं इको-फ्रेंडली

कई जगह पर मूर्तिकार कर रहे वॉटर कलर का उपयोग, अब सिर्फ कृत्रिम कुंडों विसर्जन

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कटनी

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Balmeek Pandey

Aug 19, 2025

Eco-friendly idols of Lord Ganesha are being made

Eco-friendly idols of Lord Ganesha are being made

कटनी. गणेशोत्सव अब केवल भक्ति और आस्था का नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भी पर्व बन चुका है। पिछले 8-10 सालों में शहर ही नहीं, पूरे जिले में गणेश प्रतिमाओं का स्वरूप बदल गया है। पहले जहां बाजार पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) की चकाचौंध मूर्तियों से भरा रहता था, वहीं अब 80 प्रतिशत से अधिक प्रतिमाएं मिट्टी से बन रही हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि कलाकारों की जिद, प्रशासन की पहल और लोगों की बढ़ती समझ ने मिलकर इसे संभव किया।
जिले में 12 हजार से अधिक छोटी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित हो रही हैं। समितियों सहित घर-घर लोग स्थापना कर विघ्नहर्ता की पूजा करते हैं। ये प्रतिमाएं मिट्टी, लकड़ी, पैरा व बांस से बनी होती हैं। मिट्टी की प्रतिमाएं प्रकृति का हिस्सा बनकर विसर्जन के बाद आसानी से घुल-मिल जाती हैं। ये नदियों और तालाबों को प्रदूषित नहीं करतीं। इसके विपरीत पीओपी की मूर्तियां सालों तक नहीं घुलतीं और जलाशयों की जीवनदायिनी धारा को दूषित करती हैं। यही कारण है कि आज भक्त मिट्टी के गणेश को ही सच्ची श्रद्धा और प्रकृति प्रेम का प्रतीक मान रहे हैं। यह सिर्फ बदलाव की नहीं, बल्कि सकारात्मकता और प्रतिबद्धता की कहानी है। गणेशोत्सव ने सिखाया है कि जब समाज, कलाकार, प्रशासन और श्रद्धालु साथ मिलते हैं, तो प्रकृति और आस्था दोनों सुरक्षित रहती हैं।

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कलाकारों की कहानी, संघर्ष से सफलता तक


प्रेमरामायण समाज भवन के मूर्तिकार कार्तिक पॉल बताते हैं कि दो दशक पहले तक बाजार में मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग बहुत कम थी। पीओपी की चमकदार मूर्तियां तेजी से बिकती थीं। लोग कहते थे मिट्टी की मूर्तियां सुंदर नहीं दिखतीं, लेकिन हमने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे डिजाइन और रंगों में सुधार किया और लोगों को समझाया कि मिट्टी की प्रतिमा ही पकृति के अनुकूल हैं। इसी तरह मूर्तिकार रवि पॉल और मुकेश कुम्हार ने भी पीओपी से दूरी बनाकर केवल मिट्टी का ही उपयोग शुरू किया। आज वे गर्व से कहते हैं कि उनकी मेहनत से ही बाजार में इको-फ्रेंडली गणेश की धूम है।

भक्तों का अनुभव: श्रद्धा और संतोष

राहुल बाग के पीछे रहने वाले अंजनेय तिवारी बताते हैं कि वे पिछले 7 सालों से केवल मिट्टी की प्रतिमा ही घर लाते हैं। गणपति बप्पा को पूजा के बाद प्रकृति को समर्पित करना सबसे सही लगता है। यह संतोष देता है कि हमारी आस्था से प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंच रहा। वहीं अवध पांडेय कहते हैं कि मिट्टी के गणेश न सिर्फ पर्यावरण की रक्षा करते हैं, बल्कि बच्चों को भी यह सीख देते हैं कि त्योहार मनाने का मतलब प्रकृति को नुकसान पहुंचाना नहीं है। नीत हुंजन कहते हैं कि पर्वों में हमें प्रकृति की सुरक्षा का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर साल वे इको-फ्रेंडली गणेशजी स्थापित करते हैं।

कृत्रिम कुंड बने समाधान

नगर निगम आयुक्त नीलेश दुबे के अनुसार अब शहर में 5 से अधिक कृत्रिम कुंड बनाए जा रहे हैं। ये कुंड मसुरहा घाट, गाटरघाट, पीरबाबा घाट, माई नदी, बंजगरंग कॉलोनी आदि स्थान पर बनाए जाते हैं, जहां 5 हजार से अधिक प्रतिमाओं का विसर्जन कर प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाया जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले 5 सालों में पीओपी की मूर्तियों की संख्या में 70 प्रतिशत से अधिक कमी आई है।

बड़े पर्यावरणीय सुधार की दरकार

गल्र्स कॉलेज के पर्यावरणविद फूलचंद कोरी कहते हैं कि मिट्टी की प्रतिमाओं को अपनाना जल संरक्षण और प्रदूषण रोकने की दिशा में बड़ा कदम है। तालाबों में पीओपी का न घुलना जलीय जीवन को नष्ट कर रहा था, लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है। जिला प्रदूषण अधिकारी सुधांशु तिवारी बताते हैं कि नगर में पिछले दो वर्षों में विसर्जन में बड़ा बदलाव आया है। लोग कृत्रिम कुंडों में ही विसर्जन कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि लोग और कलाकार दोनों ही सचेत हो रहे हैं।

जहर घुलना नहीं हुआ बंद

भले ही लोगों में जागरूकता आ गई और लोग शत प्रतिशत प्रतिमाओं का विसर्जन कृत्रिम कुंडों में करने लगे हैं, लेकिन नदियों में शहर के नालों का जहर घुलना बंद नहीं हुआ। अभी भी बेरोक-टोक नालों का गंदा पानी मिल रही है। सिस्टम कटनी नदी के अमृत को विषैला किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि क्या वजह है कि नदियों व जलस्रोतों में मिलने वाले नालों को प्रशासन रोक क्यों नहीं पा रहा।

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लोग दिखाएं जागरुकता

अभी भी समाज में 10 से 20 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो पीओपी, केमिकल युक्त वाली प्रतिमाएं स्थापित करते हैं, उन्हें चाहिए कि वे जागरूकता दिखाएं और इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं स्थापित करें। पर्यावरण की रक्षा के लिए वर्षों से कार्य करने वालीं जागृति पार्क प्रमुख डॉ. उमा निगम कहती हैं, मिट्टी की मूर्तियां पानी में 10-15 मिनट में घुलकर मिट्टी बन जाती हैं, जबकि पीओपी की मूर्तियां महीनों तक पानी में तैरती रहती हैं, जिससे जल प्रदूषण और जलीय जीवों को नुकसान होता है। पत्रिका के प्रकृति से जुड़ो, गणेश मनाओ अभियान जो लोगों को मिट्टी की मूर्तियों के महत्व के प्रति जागरूक करेगा।