
book
खंडवा . सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन ( सीबीएसई ) का नया शैक्षणिक सत्र कल से शुरू हो रहा है। बच्चों की कापी, किताबें और स्कूल ड्रेस खरीदने अभिभावकों की भीड़ पुस्तक विक्रेताओं के यहां बढ़ गई है। किताबें स्कूल संचालकों के चुनिंदा दुकानों पर मिलने से अभिभावक परेशान हैं। शहर के नामी स्कूलों की किताबें संचालकों की पसंदीदा दुकानों पर ही मिल रही है। भीड़ अधिक होने से अभिभावकों को परेशानी हो रही है।
शहर की चिह्नित दुकान पर ही किताब मिलने की सूचना से अभिभावकों में असंतोष है। अभिभावक सुमन श्रीवास्तव ने कहा कि बेटा सेट जोसेफ में पढ़ता है। किताबें सिर्फ दो दुकानों पर मिलती हैं। पूछने पर बताया कि सरस्वती और पारस स्टेशनरी पर ही मिलती है। भीड़ लगने के कारण तीन दिन से लौट रही हूं। इन दुकानों पर कई अन्य स्कूलों की किताबें खरीदने भीड़ रहती है। कापी, किताबें का अस्सी फीसदी बाजार तीन पुस्तक विक्रेताओं के कब्जे में है। अधिकतर स्कूल संचालकों ने सरस्वती, पारस स्टेशनरी, राठी बुक सेंटर और सकलेचा की दुकान पर ही अनुबंध कर रखा है। सरस्वती व आनंद नगर में पारस स्टेशनरी में छह से अधिक स्कूलों की किताबें हैं। सकलेचा और राठी के यहां भी कमोवेश इतनी ही स्कूलों की किताबें हैं। शेष दुकानों में किताबें नहीं मिलेंगी।
अभिभावकों ने बताया कि ये पुस्तक विक्रेता किसी तरह की छूट नहीं देते हैं। एमआरपी में छूट देने की बात दूर किताब पर चढ़ाने के लिए कवर तक नहीं देते। इसी तरह ड्रेस के लिए दुकानेें फिक्स हैं।
निजी स्कूलसंचालकों की चुनिंदा दुकानों पर कॉपी, किताब और मिल रही स्कूल ड्रेस
ऐसे समझें मनमानी
पहली से लेकर आठवीं तक तीन हजार से पांच हजार रुपए तक सेट देते हैं। एक ही कक्षा की किताबें भाव अलग-अलग हैं। कक्षा दो के किताबों का सेट 2600 से 3000 रुपए तक है। कक्षा तीन की 3400 से 3800 रुपए तक बेच रहे हैं। एक ही कक्षा की किताबें स्कूल बदलते ही उनके भाव भी बदल जाते हैं। स्कूल संचालकों की चुनिंदा दुकानों पर महंगी किताबों को लेकर अभिभावक परेशान हैं।
खुला बाजार होना चाहिए
कापी-किताब के लिए खुला बाजार होना चाहिए। स्कूलों की दुकानें निर्धारित होने से एक साथ भीड़ बढ़ने से परेशानी होती है। दुकानदार मनमानी पैसे लेते हैं। किताब, कापी और स्कूल ड्रेस खरीदने किसी भी स्कूलों की बाध्यता नहीं होनी चाहिए। अभिभावक को कहीं से भी खरीदने की आजादी होनी चाहिए।
संजय दुबे, अभिभावक,
सरकारी स्कूलों की किताबें सभी दुकान पर मिल जाती हैं। निजी स्कूलों में पब्लिकेशन अलग-अलग होते हैं। दुकानदार सभी पब्लिकेशन की किताबें नहीं बेचते हैं। इससे अभिभावकों को चिह्नित दुकानों पर ही जाना पड़ता है। अभिभावकों में डिजिटल कंटेंट की रुचि बढ़ रही है।
दीपाली खोती, लायंस क्लब,
निजी स्कूलों में सिलेबस अलग-अलग होने से अभिभावक परेशान होते हैं। सभी का सिलेबस एक होना चाहिए। ताकि सभी दुकानों पर किताबें मिल सके। इससे अभिभावकों को सहूलियत मिलेगी और स्कूल संचालकों की मनमानी पर लगाम लगेगी। नई शिक्षा नीति के तहत शासन को प्रभावी कदम उठाना चाहिए।
आशीष वर्मा, सदस्य, जागरूक पालक संघ,
निजी स्कूलों का दुकानों से अनुबंध के कारण अभिभावकों को दिक्कत होती है। स्कूल संचालक मुनाफा के लिए अलग-अलग पब्लिकेशन की किताबें लगते हैं। किसी स्कूल में आठ तो किसी में दस किताबें लगती हैं। किताबों का तीन से पांच हजार रुपए में मिलते हैं। इसी तरह ड्रेस के लिए दुकानें चिह्नित हैं। संजय श्रीमाली, सदस्य, जागरूक पालक संघ,
Published on:
31 Mar 2023 12:44 pm
बड़ी खबरें
View Allखंडवा
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
