
First film on the life of Hind Kesari wrestler in khandwa
खंडवा. पहलवानी में निमाड़ का परचम लहराते हुए हैदराबाद में वर्ष १९५८ में प्रथम हिंद केसरी का खिताब जीतने वाले पहलवान रामचंद्र बाबूलाल केसरी के जीवन पर फिल्म बनेगी। फिल्म के निर्देशक मुकेश आरके चौकसे ने बताया फिल्म में नेपानगर निवासी प्रथम हिंद केसरी रामचंद्र बाबूलाल केसरी की रियल लाइफ को हू बा हू रील लाइफ में दिखाया जाएगा। इसके लिए १५ मार्च से फिल्म की शूटिंग खंडवा से शुरू की जाएगी। फिल्म में पहलवान रामचंद्र बाबूलाल का किरदार इंदौर के कलाकार महेंद्र जैन उर्फ नाना निभाएंगे। फिल्म के निर्माता मोहित मालवीय ने कहा फिल्म की शूटिंग खंडवा सहित इंदौर, हैदराबाद, प्रतापगढ़, हरियाणा, अलवर और नेपानगर, बुरहानपुर में की जाएगी। इसमें स्थानीय कलाकारों को योग्यतानुसार किरदार दिए जाएंगे। इसके अलावा बालीवुड के कलाकार शक्ति कपूर, प्रेम चोपड़ा, रंजीत, हेमंत विरजे, प्रीति चौकसे, अरुण बकक्षी, शहबाज खान, मुस्ताक, अहसान आदि फिल्म में अलग-अलग किरदारों में नजर आएंगे।
एशियाड़ खेलों में कहा था जमीन देंगे
प्रथम हिंद केसरी रामचंद्र बाबूलाल केसरी (86) निवासी नेपानगर ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा १९५८ में हैदराबाद में पहलवान ज्ञानीसिंह दिल्ली को हराकर हिंद केसरी का खिताब जीता था। इसी बीच दिल्ली में आयोजित एशियाड़ खेलों में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने बुलाया था। यहां मंच से मुझे 50 से 100 हेक्टेयर जमीन देने की घोषणा की थी, लेकिन यह जमीन अब तक नहीं मिल पाई है। इतना ही नहीं नेपानगर में अखाड़ा संचालित करता था। वह अखाड़ा भी मुझसे छीन लिया गया है। इस समय बच्चों की कमाई से पेट पालना पड़ रहा है।
पहले दो अब खाते हैं डेढ रोटी
पहलवान की पत्नी सीताबाई बताती है कि हिंद केसरी रामचंद्र से उनकी शादी वर्ष १९५९ में हुई थी। उन्होंने वर्ष १९९२ तक कुश्ती लड़ी। फिर अखाड़ा चलाने लगे। कुश्ती के दौरान वह दो रोटी खाते थे। इसके अलावा २५० ग्राम घी, बादाम और दो लीटर दूध पीते थे। साथ ही फल खाते थे। ८६ वर्ष की उम्र में भी वह अपने सभी काम स्वयं करते हैं। इस समय पहलवान डेढ रोटी खाकर पेट भरते हैं।
पिता की स्थिति देख बेटे नहीं उतरे अखाड़े में
पहलवान रामचंद्र केसरी के पांच बेटे हैं। सभी बेटे अलग-अलग स्थानों पर काम कर रहे हैं। बेटों के पहलवान नहीं बनने का कारण जब पहलवान की पत्नी से पूछा तो उन्होंने कहा छोटे बेटे सुनील को वो अखाड़ा ले जाते थे। कुछ समय तक बेटा अखाड़ा गया, लेकिन पिता की दयनीय स्थिति देख वह पीछे हट गया। प्रथम हिंद केसरी बनने के बाद भी पिता को कमाई के तौर पर मात्र पांच हजार रुपए मिलते थे। उन्हें न तो पेंशन मिलती और न ही कोई अन्य सुविधा दी गई है। भविष्य को देखते हुए बेटों ने पहलवानी से मुंह फेर लिया और पढ़ाई कर नौकरी की ओर बढ़ गए।
Published on:
05 Mar 2018 10:37 pm
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