संत सिंगाजी धाम पर शरद पूर्णिमा पर लगता है आस्था का मेला, आज भी होते हैं चमत्कार

शरद पूर्णिमा से एक दिन पहले ही श्रद्धालुओं का जत्था पहुंचा, दो प्रदेशों की संस्कृति का होता है यहां संगम...।

By: Manish Gite

Published: 29 Oct 2020, 06:25 PM IST

 

भोपाल। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की संस्कृति का मिलन यही होता है। इसी क्षेत्र में मिलती है दो प्रदेशों की संस्कृति। निमाड़ के प्रसिद्ध संत सिंगाजी की समाधि पर हर साल लगता है आस्था का मेला। शरद पूर्णिमा से यहां लगने वाले मेले में आते हैं दो से तीन लाख लोग आते हैं। महाराष्ट्र और निमाड़ की संस्कृति और परंपरा के मिलने वाले इस मेले की पहचान विदेशों तक पहुंच चुकी है। यह स्थान हरसूद के बीड़ में है।


संत सिंगाजी समाधि स्थल पहुंचने के लिए गांव-गांव से श्रद्धालुओं के जत्थे रवाना हो गए हैं। शरद पूर्णिमा पर सिंगाजी के दर्शन की आस लिे भजनों के साथ पैदल चलते हुए लोगों का पहुंचना शुरू हो गया। गुरुवार को भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु झंडा चढ़ाने के लिए पहुंचे।

 

परंपराओं का होता है संगम

यहां लोक परंपराओं का अनूठा संगम भी देखने को मिलता है। यहां पूर्वी निमाड़, पश्चिमी निमाड़, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की संस्कृति मिलती है। यहां लोकरंग और अनेक लोक गीतों से मेले का लुत्फ लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

 

कौन थे सिंगाजी महाराज

  • मालवा और निमाड़ के प्रसिद्ध संत सिंगाजी का जन्म 1519 ई. में पिपलिया नामक कस्बे के निकट खजूरी गाँव में एक ग्वाला परिवार में हुआ था। इनके जन्मस्थान (खजूरी ग्राम) का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया है।
  • सिंगाजी मध्य प्रदेश में खंडवा से 28 मील उत्तर-पूर्व हरसूद तहसील का एक छोटा-सा गांव है। हरसूद का निर्माण हर्षवर्धन द्वारा किया गया था। इसी गांव में सिंगाजी एक सामान्य गोपाल या अहीर परिवार में जन्मे थे। वे बचपन से ही एकांत स्वभाव के थे। जब वन में जानवरों को चराने जाते तो वहां प्रकृति के बीच रमे रहते थे।
  • 16वीं शताब्दी में सिंगाजी की प्रतिभा से प्रेरित होकर गांव के जमींदार ने उन्हें अपना सरदार बना दिया था। सिंगाजी ने 12 वर्ष जमींदार की सेवा की। अपनी आध्यात्मिक करामाती शक्तियों से ज़मींदार के लिए कई लड़ाइयों में विजय भी प्राप्त की।
  • संत सिंगाजी को निमाड़ का कबीर भी कहा जाता है। आज भी निमाड़ में उनके जन्म स्थान व समाधि स्थल पर उनके पदचिह्नों की पूजा-अर्चना की जाती है। उनके चमत्कार आज भी लोग महसूस करते हैं।
  • पशुपालक उन्हें पशु दूध और घी अर्पण करते हैं। इन स्थानों पर घी की अखण्ड ज्योत भी प्रज्वलित रहती है।
  • पिता भीमाजी गवली और माता गवराबाई की तीन सन्तान थीं। बड़े भाई लिम्बाजी और बहन का नाम किसनाबाई था। सिंगाजी का जसोदाबाई के साथ विवाह हुआ था। इनके चार पुत्र—कालू, भोलू, सदू और दीप थे। सिंगाजी के जन्म और समाधिस्थ के बारे में विद्वानों के मत अलग-अलग है। कोई उनका जन्म 1574 में बताता है तो कोई 1576 में। इसके अलावा किसी विद्वान ने उनका जन्म 164 और 1616 बताया है।


ऋषि की संतान थे सिंगाजी

मान्यता है कि श्रृगी ऋषि ने ही सिंगाजी के रूप में जन्म लिया था। संस्कृत में ‘श्रृग’ का अर्थ सींग होता है और ‘सिंगा’ भी ‘सिंग’ का ही रूप है। भजनों में भी उनकी कई कहानियां चली आ रही हैं। सिंगाजी के जन्म स्थान खजूरी की पहाड़ियों पर आज भी सफेद निशान मौजूद हैं। कहा जाता है कि यहां सिंगाजी अपने पशुओं को चराते थे और दूध दुहते थे। निमाड़-मालवा के पशु-पालक आज भी सिंगाजी को देवता की तरह पूजते हैं। पदचिन्ह के मंदिर स्थापित हैं।


डूब क्षेत्र में है समाधि स्थल

सिंगाजी महाराज का समाधि स्थल इंदिरासागर परियोजना के डूब क्षेत्र में आने की वजह से उस स्थल को 50-60 फीट के परकोटे से सुरक्षित कर मंदिर बनाया जा रहा है। निर्माण कार्य चलने की वजह से भक्तों के दर्शन के लिए संत सिंगाजी महाराज की चरण पादुकाएँ अस्थायी रूप से नजदीक के परिसर में रखी गई हैं।

मेले में यह है खास

  • 456 साल से जल रही है अखंड ज्योति
  • टनों से घी चढाया जाता है समाधि स्थल पर
  • इंदिरा सागर के बीच में है समाधि स्थल
  • दो किमी लंबा पैदल पुल पार करते हैं लाखों लोग
  • पशुओं का भी मेला लगता है
  • कई टनों से होती है फलों की खपत
  • 500 दुकानें लगती है भव्य मेले में
  • कई बड़े छोटे झूले, खानपान और जादू के शो के स्टाल लगाए जाते हैं।

 

खंडवा से पहुंचना है आसान

खंडवा से 35 किमी दूर पीपल्या ग्राम में बनी हुई है, जो बीड स्टेशन के पास है। यहां पहुंचने के लिए खंडवा से हर आधे घंटे की दूरी पर है सिंगाजी। खंडवा से हर थोड़ी देर में बसें उपलब्ध हैं। खंडवा से बीड़ रेलवे स्टेशन, जो कि पीपल्या ग्राम से 3 किमी की दूर स्थित है, तक शटल ट्रेन की सुविधा उपलब्ध है।

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