
Singer Kishore Kumar
स्वर सम्राट किशोर कुमार की 4 अगस्त को जयंती है। किशोर दा के बचपन के तीन दोस्तों के परिवारों ने पत्रिका से अनसुने किस्से साझा किए हैं। ये ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने खंडवा की गलियों से मुंबई तक दोस्ती निभाई है।
स्वर सम्राट किशोर कुमार की पहचान दुनिया के महान गायकों में होती है, लेकिन खंडवा की गलियों में आज भी लोग उन्हें अपने ' किशोर ' के रूप में याद करते हैं। 4 अगस्त को उनकी जयंती पर पत्रिका ने उनके बचपन के तीन घनिष्ठ दोस्तों के परिवारों से बातचीत की। इन परिवारों की यादों में किशोर कुमार एक बड़े सितारे नहीं, बल्कि जलेबी खाने वाले, दोस्तों के लिए हर वक्त खड़े रहने वाले और रिश्तों को जीवनभर निभाने वाले इंसान के रूप में बसे हैं। ये किस्से बताते हैं कि शोहरत मिलने के बाद भी किशोर दा का दिल हमेशा खंडवा और अपने दोस्तों के लिए धड़कता रहा।
अशोक कुमार गौर बताते हैं कि उनके काका रमेशचंद्र गौर, किशोर कुमार के बचपन के सबसे करीबी दोस्तों में थे। दोनों केवलराम चौराहे के पेट्रोल पंप पर मिलते और गल्ले से एक आना निकालकर दूध-जलेबी खाने पहुंच जाते। समय बदला, किशोर कुमार मुंबई चले गए, लेकिन दोस्ती कभी नहीं बदली। रमेशचंद्र गौर से उन्होंने वादा किया था कि जब भी खंडवा आएंगे, उनके दरवाजे से होकर ही जाएंगे। निधन के बाद भी यह वादा मानो पूरा हुआ। उनका पार्थिव शरीर पहले खरगोन में रमेशचंद्र गौर के पेट्रोल पंप पर श्रद्धांजलि के लिए रुका, फिर खंडवा लाया गया। यही दोस्ती आज भी गौर परिवार की सबसे अनमोल स्मृति है।
कारोबारी रहे रमणीक भाई मेहता, किशोर कुमार के स्कूल और कॉलेज के साथी थे। उनके नाती दर्शन मेहता बताते हैं कि दोनों साथ पढ़े और आगे की पढ़ाई के लिए इंदौर भी गए। दादाजी अक्सर एक रोचक किस्सा सुनाते थे। सिविल लाइंस क्षेत्र के जंगलनुमा इलाके में दोस्त जलेबी खिलाने का लालच देकर किशोर कुमार से गाना गवाते थे। एक दिन जब वे पूरे मन से गा रहे थे, तो आसपास घूम रहे हिरन भी मानो उस मधुर आवाज में खोकर वहीं ठहर गए। दर्शन कहते हैं कि यह सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि उस आवाज का जादू था। जिसने इंसानों के साथ प्रकृति को भी अपना दीवाना बना लिया। उनकी मांग है कि देश किशोर कुमार को भारत रत्न देकर सम्मानित करे।
बाबूभाई रंगरेज पहलवान, किशोर कुमार के ऐसे मित्र थे जिनके सामने कभी पैसों का महत्व नहीं आया। उनके बेटे नसीर रंगरेज बताते हैं कि किशोर कुमार ने कई बार पिता को पैसे और जमीन देने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने दोस्ती को सबसे ऊपर रखा। मुंबई जाने से पहले किशोर दा ने उन्हें दो दुकानें बेहद मामूली कीमत पर दी थीं। इतना ही नहीं, फिल्मों में पहलवान का किरदार दिलाने के लिए वे स्वयं उन्हें मुंबई ले जाना चाहते थे। लेकिन बाबूभाई ने खंडवा नहीं छोड़ा। नसीर कहते हैं कि आज उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि किशोर कुमार के बंगले को फिर से जीवंत बनाया जाए ।
Updated on:
04 Aug 2026 12:10 pm
Published on:
04 Aug 2026 12:10 pm
