
खंडवा। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। आपको बता दें कि कुछ लोगों को ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के घने जंगलों में परमारकालीन शिवमंदिर मिला है। जब कुछ लोग इन घने जंगलों में घूमने गए तो तब उन लोगों ने इस मंदिर को देखा। वहीं दूसरी ओर शिव जी का एक मंदिर ऐसा भी है जहां पर शिवलिंग में बिजली गिरती है।
काफी पुराना है ये मंदिर
जंगल में घूमने के दौरान कुछ लोगों को एक टीला दिखा लेकिन जब लोगों ने पास जाकर देखा तो वो कोई टीला नहीं था बल्कि एक छोटा सा काफी पुराना मंदिर था। यह मंदिर मरम्मत के अभाव में काफी जर्जर स्थिति में है। जब वे लोग मंदिर के अंदर गए तो देखा कि वहां पर शिवलिंग और कई खंडित प्रतिमाएं रखी हुई थीं। लोगों ने घने जंगलों में मंदिर मिलने की जानकारी वन विभाग को दे दी है लेकिन जंगल घना होने के कारण यहां तक पहुंचना थोड़ा कठिन है।
ऐसी है मंदिर की नक्काशी
बता दें कि घने जंगलों में मिले मंदिर पर की गई नक्काशी, ओंकारेश्वर मंदिर की तर्ज पर है। खंभे से लेकर मंदिर के मेहराब तक ओंकारेश्वर मंदिर के खंभों पर नक्काशी की तर्ज पर तराशे गए हैं। यही नहीं मंदिर की बनावट भी महामेरू प्रसादम कला की तर्ज पर उसे तैयार किया गया है, जिसे सभी कलाओं का पितामह माना गया है।
पहुंचना नहीं है आसान
यह मंदिर बड़वाह से सिद्धवरकूट और वहां से संगम के आगे ही नर्मदा के किनारे स्थित है। उसी रास्ते में यह घने जंगलों में यह मंदिर स्थित है। मंदिर की स्थिति देखकर यह लग रहा है कि जब भी यह मंदिर रहा होगा बहुत ही भव्य होगा क्योंकि खुला स्थान और नर्मदा का तट काफी शानदार है। अब इस मंदिर के संवारने की जरूरत है, ताकि पुरानी कला को संजोया जा सके। डीएफओ खंडवा एसके सिंह ने बताया कि मंदिर की जानकारी वन विभाग को मिली है। ये बहुत ही प्राचीन और छोटा मंदिर है। मंदिर के आसपास साफ-सफाई और व्यवस्थाओं के लिए वन विभाग के अधिकारियों को भी पत्र लिखा जाएगा।
बिखर जाता है शिवलिंग
ऐसा प्राचीन मंदिर मिलने कि ये कोई पहली बात नहीं बल्कि इससे पहले भी कई जंगलों में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर मिले हैं। बता दें कि शिव जी का एक ऐसा मंदिर भी है जहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है। जी हां ये मंदिल कुल्लू में स्थित है। कुल्लू शहर व्यास और पार्वती नदी के संगम के पास बसा है। यह जगह समुद्र सतह से 2,450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर के लिए माना जाता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप का एक रूप है जिसका वध भगवान शिव ने किया था। यहां पर जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की गई है वहां हर साल बिजली गिरती है, जिसके चलते शिवलिंग पूरी तरह से खंडित हो जाता है। उस खंडित शिवलिंग को मंदिर के पुजारी ने मक्खन एकत्रित करके वापस जोड़ा, जो बाद में रहस्मय रुप से ठोस हो गया।
ये है पूरी कहानी
कहा जाता है कि यहां पहले कुलांत नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। दैत्य अजगर कुण्डली मार कर व्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीव-जंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे। भगवान शिव कुलांत के इस विचार से चिंतित हो गए। तब भगवान शिव ने उस राक्षस अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलांत पीछे मुड़ा तभी शिव ने कुलान्त के सिर पर त्रिशूल वार कर दिया। प्रहार से कुलांत मारा गया। कुलांत के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया। उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा की पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया।
कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। किंवदंती है कि कुलांत से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम पड़ा। कुलांत दैत्य के मरने के बाद शिव ने इंद्र से कहा कि वे 12 वर्ष में एक बार इस जगह पर बिजली गिराया करें। हर 12 वर्ष में यहां आकाशीय बिजली गिरती है। इस बिजली से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित करके शिवजी का पुजारी मक्खन से जोड़कर स्थापित कर लेता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है।
Published on:
16 Jan 2018 04:20 pm
बड़ी खबरें
View Allखंडवा
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
