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पारंपरिक के सामने धोखे का “ग्रीन पटाखा”

लाइसेंसी दुकानों पर नहीं ग्रीन पटाखे, मंहगी कीम पर बिक रहे पारंपरिक पटाखे, प्रदूषण भी इस बार ज्यादा होगा

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खंडवा. पारंपरिक पटाखों के आगे ग्रीन पटाखे महज एक धोखा हैं। ग्रीन पटाखे कहकर कुछ व्यापारी अपना मुनाफा तो कर रहे हैं, लेकिन असल में वह ग्रीन पटाखे नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद शिवकाशी में पटाखों के निर्माण में कमी आई है। जिसका असर सीधे तौर पर आतिशबाजी कारोबार पर पड़ा है। पटाखा निर्माण करने वाली कई फैक्ट्री बंद होने से पटाखों की कीमत 50 फीसदी तक बढ़ी है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश ने स्ट्रिंग पटाखों के निर्माण पर प्रतिबंध लगाया है। इसके साथ ही आतिशबाजी में काम आने वाले विशेष प्रकार के रसायन बरी उम नाइट्रेट पर भी रोक लगाई है।
क्या है ग्रीन पटाखा
राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान ने ग्रीन पटाखे की खोज की है। यह पारंपरिक पटाखों की तरह होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है। अदालत ने ऐसे पटाखों पर प्रतिबंध लगाया है जो मानव, जानवर और पर्यावरण के हानिकारक हैं। ऐसे में सामन्य पटाखों के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।
यहां गुलजार है बाजार
अधिक प्रदूषण करने वाले पटाखे मंहगी कीमतों पर बाजार में बिक रहे हैं। कुछ समझदार लोगों ने पहले से कम पटाखे लिए हैं। उनका मानना है कि मंहगाई के इस दौर में प्रदूषण से बचना जरूरी है। बाजार में बिक रहे पटाखों पर प्रशासन की नजर होना चाहिए लेकिन यहां सब तालमेल बैठा कर ही व्यापार हो रहा है।
नियम कोई नहीं मानता
नियमों का पालन कराने वाले ही नजर फेर लेते हैं, तो भला नियम कायदों की परवाह कौन करेगा। बाजार में अमानक पटाखे तो बिक ही रहे हैं, साथ ही इन्हें बेचने के लिए तय किए गए केन्द्र के नियमों का पालन भी स्थानीय प्रशासन नहीं करा पाया।