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यहां बनते थे प्राकृतिक नर्मदेश्वर महादेव शिवलिंग

महाशिवरात्रि पर विशेष-धाराजी के धावड़ी कुंड में बने शिवलिंग होते थे स्वयंभू प्राण प्रतिष्ठित-ओंकारेश्वर बांध की डूब में आने के बाद खो गया धाराजी घाट

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खंडवा

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Manish Arora

Feb 21, 2020

यहां बनते थे प्राकृतिक नर्मदेश्वर महादेव शिवलिंग

महाशिवरात्रि पर विशेष-धाराजी के धावड़ी कुंड में बने शिवलिंग होते थे स्वयंभू प्राण प्रतिष्ठित-ओंकारेश्वर बांध की डूब में आने के बाद खो गया धाराजी घाट

खंडवा. निमाड़ और मालवा के लोगों के लिए खंडवा जिले की सीमा से लगे देवास के धावड़ी कुंड जिसे धाराजी कहा जाता है, का विशेष महत्व था। ओंकारेश्वर बांध की डूब में आने के बाद धाराजी का अस्तित्व खो गया। यहां नर्मदा के पानी में प्राकृतिक शिवलिंग का निर्माण होता था। इन शिवलिंग को नर्मदेश्वर शिवलिंग कहा जाता था। नर्मदेश्वर या बाण शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं होती थी। शिवलिंग स्वयंभू प्राण प्रतिष्ठित होते थे।
2007 में ओंकारेश्वर बांध मे पानी भरने से बांध के बेक वाटर से धाराजी डूब में आ गया। देवास जिले का धावड़ी कुंड घाट या धाराजी देवास और खंडवा जिले का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल था। यहां संपूर्ण नर्मदा 50 फुट से गिरती थी जो कि बहुत मनोहारी दृश्य दिखता था। जलप्रपात के गिरने फलस्वरूप पत्थरों में 10-15 फुट व्यास के गोल (ओखल के आकार के) गड्ढे हो गए था। नर्मदा में बहकर आए पत्थर इन गड्ढों में गिरकर पानी के सहारे गोल-गोल घूमते हैं, जिससे घिस-घिसकर ये पत्थर शिवलिंग का रूप ले लेते हैं। ऐसा लगता है जैसे नर्मदा स्वयं अपने आराध्य देव को आकार देकर सतत उनका अभिषेक करती हो। इन्हें 'बाण' या नर्मदेश्वर महादेव का नाम दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि धाराजी के स्वयंभू बाणों की प्राण-प्रतिष्ठा करना आवश्यक नहीं, ये स्वयंभू होकर प्राण-प्रतिष्ठित होते थे। धाराजी से उत्तर में लगभग 10 किमी पर सीता वाटिका, जिसे सीता वन भी कहते हैं, में सीता मंदिर भी स्थित है। नर्मदा परिक्रमा करने वाले धाराजी से चल कर इन पौराणिक और दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करते हुए तरानीया, रामपुरा, बखतगढ़ होते हुए चौबीस अवतार जाते हैं। पुरातत्व, पर्यावरण, वन भ्रमण की दृष्टि से कावडिय़ा पहाड़, कनेरी माता आकर्षण का केंद्र हैं। वहीं विहंगम दृश्यावलियों से पूर्ण पर्यटन स्थल है।