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अगली पीढ़ी नहीं बोल-सुन पाएगी आदिवासी कोरकू भाषा

-विलुप्तता की कगार पर 196 भाषाओं में शामिल कोरकू-हिंदी, मराठी, उर्दू भाषा के शब्द होते जा रहे इसमें शामिल-कोरकू भाषा को बचाने के लिए स्पंदन कर रहा पहल

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खंडवा

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Manish Arora

Aug 09, 2020

अगली पीढ़ी नहीं बोल-सुन पाएगी आदिवासी कोरकू भाषा

-विलुप्तता की कगार पर 196 भाषाओं में शामिल कोरकू-हिंदी, मराठी, उर्दू भाषा के शब्द होते जा रहे इसमें शामिल-कोरकू भाषा को बचाने के लिए स्पंदन कर रहा पहल

खंडवा.
यूनेस्को की विश्व भाषाओं के एटलस के अनुसार विश्व से लगभग 6700 भाषाएं इस सदी के अंत तक विलुप्त होने का खतरा झेल रही है। इसमें भारत की 196 भाषाएं, जिसमें जनजातीय भाषा कोरकू भी शामिल है। आदिवासी कोरकू भाषा की कोई लिपि नहीं होने से इसे देवनागरी लिपि में लिखा जा रहा है। धीरे धीरे कर इस भाषा को बोलने वाले कम होते जा रहे है, जिसके कारण ये भाषा विलुप्तता का खतरा झेल रही है। खुद की लिपि नहीं होने और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इसका हस्तातंरण न होना भी इसकी विलुप्तता का एक कारण है। आदिवासी समाज के लिए कार्य कर रही स्पंदन समाज सेवा समिति ने अब इस भाषा को बचाने की पहल की है।
कोरकू भाषा मध्य भारत में मप्र और महाराष्ट्र के कुछ भागों में बोली जाती है। मप्र में यह भाषा खंडवा (पूर्व निमाड़), बैतुल और होशंगाबाद के उन हिस्सों में बोली जाती हैं, जहां कोरकू जनजाति कि बाहुल्यता है। मप्र और महाराष्ट्र में कोरकू जनजाति की कुल जनसंख्या 9 लाख 95 हजार 399 (जनगणना 2011) है। इसमें कोरकू बोलने वाले लोगों की जनसंख्या 7 लाख 27 हजार 133 हैं। कोरकू भाषा ऑस्ट्रो एशियाटिक मूल कि भाषा है और इसे मुंडा परिवार की भाषा माना गया है। इसकी कोई लिपि नहीं है, इसलिए इसे देवनागरी या अंग्रेजी लिपि में लिखा जाता रहा है।
अन्य भाषाओं से ले रहे शब्द उधार
समय के साथ कोरकू जनजाति ने अपने शिकार, संग्रहक जीवन से स्थिर जीवन अपनाया और इस प्रक्रिया में अन्य समुदायों के संपर्क में आए और इनकी भाषा में परिवर्तन नजर आने लगा। खंडवा जिले के कोरकू बोली में अब मराठी, हिंदी, उर्दू और निमाड़ी भाषा का अत्यधिक प्रभाव नजर आता है। नए शब्द इस बोली में बनने बंद हो गए हैं और नई वस्तुओं या अनुभव के लिए अन्य भाषाओं से शब्द आयात किए जा रहे हैं। उदाहरण स्वरुप जंगल में घुमंतु जंगली पशु जैसे शेर के लिए कुला या भालू के लिए बाना शब्द बनाए, पर पालतू जानवर जैसे गाय के लिए गई या बतख के लिए बदख शब्द हिंदी भाषा से लिए। इसी प्रकार जायदाद के लिए जाजातो, किसान के लिए किरसान, पैसों के लिए डामा और डॉक्टर के लिए डागदर शब्द अन्य भाषाओं से लिए गए।
आंगनवाड़ी में सीखा रहे कोरकू भाषा
विगत दशकों में कोरकू जनजाति के मध्य अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने के प्रति रुचि बढ़ी है। खंडवा जिले में स्पंदन समाज सेवा समिति ने इसमें कई पहल की हैं। कोरकू भाषा के सरंक्षण और संवर्धन के लिए, उनके इतिहास, रीति रिवाज, भाषा और जीवन के कई पहलुओं पर शोध कर दस्तावेज तैयार किए हैं। स्पंदन का मानना है कि हर बच्चे को अपनी मातृभाषा में कम से कम प्रारंभिक शिक्षा मिलनी चाहिए। संस्था द्वारा आंगनवाड़ी, स्कूल पूर्व शिक्षा के लिए नवाचार के तहत कोरकू भाषा में कई चार्ट और पोस्टर तैयार किए हैं। इसी तर्ज पर खंडवा जिला प्रशासन द्वारा हिंदी, निमाड़ी और कोरकू भाषा में मैन्युअल तैयार किए गए हैं, जो आंगनवाड़ी केंद्रों पर इस्तेमाल किए जा रहे है।
भाषा को बचाना अति आवश्यक
इस भाषा को जो मौखिक परंपराओं तक सीमित है, बचाना अति आवश्यक है। उस नुकसान कि कल्पना भी नहीं कि जा सकती जो किसी भाषा के खो जाने से हो सकती है। भाषा के साथ एक समुदाय का अस्तित्व, अभिव्यक्ति, लोक परंपरा और अभूतपूर्व ज्ञान का भंडार हमेशा के लिए खो जाते हैं।
सीमा प्रकाश, स्पंदन समाज सेवा समिति