
amazing facts of India's independence movement
खंडवा. मैं मुल्क की हिफाजत करूंगा, ये मुल्क मेरी जान है। इसकी रक्षा के लिए, मेरा दिल और जां कुर्बान है...यह पंक्तियां सरहद पर मुस्तैद रहकर देश सेवा कर अब पुलिस में आकर जन सेवा कर रहे जवानों पर सटीक बैठती हैं। अपने तेवर और देशभक्ति के जुनून के साथ खंडवा पुलिस में दो आर्मी जवान सेवा दे रहे हैं। जवानों का कहना है कि सरहद पर रहकर देश की सेवा तो कर ली, लेकिन जन सेवा करने की कसक अभी बाकी है। इसलिए पुलिस विभाग में आकर जन सेवा कर रहे हैं। इतना ही नहीं इन जवानों के कार्य करने की शैली और जुनून को देख पुलिसकर्मी भी कार्य के प्रति प्रोत्साहित हो रहे हैं।
सेंध लगाने की फिराक में आए आतंकियों को किया ढेर
ग्वालियर निवासी रामकुमार सिंह गौतम आर्मी में वर्ष १९९५ से २०१२ तक पदस्थ रहे। इस दौरान जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में उन्हें वर्ष २०१० में तैनात किया गया। रामकुमार बताते हैं कि कुपवाड़ा में तैनाती के दौरान ८ नवंबर २०१० को मैंअबूस में ड्यूटी कर रहा था। तभी आतंकी घुसपैठ करने की फिराक में आ रहे थे। मेरी उन पर नजर पड़ी। देखते ही मैं सजग हुआ और निशाना साधकर बैठ गया। इन स्थितियों में वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना देने का भी समय नहीं था। सुरक्षा को देखते हुए तुरंत निर्णय लिया और तबाड़तोड़ गोलियां दागना शुरू कर दिया। मौके पर ही दो आतंकियों को ढेर किया। वहीं एक आतंकी जख्मी हालत में फरार हो गया। फरार आतंकी ने कुछ दिन बाद सरेंडर किया। इस कार्य के लिए रामकुमार को राष्ट्रपति वीर पुरस्कार से नमाजा गया था। आंतकियों से मुठभेड़ की अन्य कार्रवाइयों में रामकुमार ने अपनी भूमिका निभाई है।
आर्मी छोड़ी, लेकिन जुनून नहीं हुआ कम
रामकुमार बताते है कि वर्ष २०१२ में माता-पिता की तबीयत खराब रहने लगी। घर में अकेला होने के कारण जिम्मेदारी बढ़ गई। पारिवारिक समस्याओं को देखते हुए मजबूरन आर्मी छोड़कर आना पड़ा। यहां आने के बाद कुछ दिन में माता-पिता गुजर गए। परिवार को सेटिल किया, लेकिन देश सेवा की कसक हमेशा बनी रहती थी। जिसके चलते दोबारा पुलिस की तैयारी शुरू की। जिसके चलते वर्ष २०१६ में एसआई की परीक्षा पास की। अब पुलिस में रहकर सिर्फ जनसेवा करने की उमंग है।
कारगिल युद्ध की याद आते ही खड़े हो जाते हैं रोंगटे
खरगोन जिले के छोटे से गांव माकडख़ेड़ा निवासी आशीष कुमार रुईवाले वर्ष १९९३ से २००९ तक आर्मी में हवलदार पद पर पदस्थ रहे। इस दौरान उन्होंने ग्वालियर, पठानकोट, जम्मू कश्मीर, बबीना आदि स्थानों पर अपनी सेवाएं दी। आशीष बताते हैं कि वर्ष १९९९ में कारगिल युद्ध शुरू हुआ। जिसके चलते मुझे पठानकोट में तैनात किया गया। जहां से सरहद पर चल रही लड़ाई का लगातार अपडेट लिया जा रहा था। हमारे जांबाज फौजी जुनून और जज्बे के साथ दुश्मनों का सामना कर रहे थे। चारों तरफ गोलियां और बम के धमाके सुनाई देते थे। जब भी कारगिल युद्ध की याद आती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसी बीच जम्मू में भी देशसेवा में तैनात रहा।
नाम से नहीं मेजर से पहचाने जाते हैं आशीष
पुलिस विभाग में आरक्षक पद पर पदस्थ आशीष कुमार पूरे शहर में नाम से नहीं बल्कि मेजर से पहचाने जाते हैं। छोटे से लेकर बुजुर्ग व्यक्ति आशीष को मेजर कहकर पुकारता है। आशीष बताते है कि वर्ष २००९ में आर्मी से सेवानिवृत्त हुआ, लेकिन देशभक्ति और जनसेवा को जूजून कम नहीं हुआ। लौटने के बाद कुछ दिन घर पर रहा। फिर पुलिस में आकर नौकरी ज्वाइंन की। पुलिस में आने का मकसद सिर्फ जन सेवा करना है। अलग-अलग थानों में कार्यरत रहकर आशीष ने कई लोगों की मदद की है। यही बजाय है कि लोग आशीष को प्यार से मेजर के नाम से पुकारते हैं।
Published on:
14 Aug 2018 01:27 am
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