4 अप्रैल 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

75 किमी की यात्रा पर पैदल निकल पड़े 50 हजार लोग

कृषि उपज मंडी से सुबह श्रद्धालु कोठवा और फिर सिद्धवरकूट होते हुए ओंकारेश्वर पहुंचे, 75 किमी की यात्रा पूर्ण कर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से हुआ समापन, 50 हजार श्रद्धालु हुए शामिल

2 min read
Google source verification
panchkoshi_yatra_badwah.png

बड़वाह. निमाड़ क्षेत्र की सबसे बड़ी यात्रा के रूप में जानी जाती पंचकोशी यात्रा का उत्साहपूर्वक समापन हो गया. कभी मुट्ठी भर यात्रियों के साथ शुरू हुई यह यात्रा अब हजारों यात्रियों के काफिले के साथ वृहद रूप धारण कर चुकी है। नर्मदा की इस लघु परिक्रमा के लिए इस बार 50 हजार लोग करीब 75 किमी तक पैदल चले.

पंचकोशी यात्रा का काफिला चौथे दिवस अपने अंतिम पड़ाव कोठावा के लिए सुबह से ही निकला। नगर में भगवान नागेश्वर महादेव के पूजन अर्चन.दर्शन के पश्चात सुदूर घने वन सिद्धवरकूट की ओर भजन कीर्तन करते हुए पंचकोशी यात्री गुजरे। चार दिनों में 75 किमी की नर्मदा परिक्रमा पूर्ण कर ओंकारेश्वर पहुंचे जहां पवित्र ज्योतिर्लिंग भगवान ममलेश्वर और ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन कर यात्रा का समापन हुआ।

पंचकोशी यात्रा का शुभारंभ शुक्रवार को ओंकारेश्वर से ही हुआ था। इसके तहत 4 दिवस की यात्रा में 50 हजार से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। यात्रा में प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, खंडवा, उज्जैन, धार सहित समूचे निमाड़ अंचल के श्रद्धालुओं ने भी भाग लिया।

दो जिले एवं तीन तहसील में पूरी की यात्रा
47वीं पंचकोशी यात्रा खंडवा जिले की मांधाता तहसील में स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर से प्रारंभ हुई थी जो खरगोन जिले की दो तहसील सनावद व् बडवाह से होते हुए 4 दिवस चली. पंचकोशी यात्रा में किसी भी प्रकार का कोई जातिवाद भेदभाव नहीं नजर आया। सभी एक साथ मिलकर भोजन पूजन अर्चन करते हैं. आश्रम मोहदरी में पंचकोशी यात्रियों के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। आश्रम परिसर में बने प्राचीन शिव को जलाभिषेक यात्रियों द्वारा एवं महंत ब्रह्मलीन महंतश्री राम गोपाल दास की प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाकर दर्शन लाभ लिया।

निमाड़ क्षेत्र की सबसे बड़ी यात्रा कहलाए जाने वाली नर्मदा लघु परिक्रमा पंचकोशी यात्रा अपने 47वें साल में प्रवेश कर गई है। कभी मुट्ठी भर यात्रियों के साथ शुरू हुई यह यात्रा हजारों यात्रियों के काफिले के साथ वृहद रूप धारण कर चुकी है। इस यात्रा की संकल्पना और इसे शुरु करने का श्रेय सनावद निवासी डॉ. रविन्द्र चौरे को जाता है। बड़वाह के स्वर्गीय पंडित मुरलीधर दुबे का भी इस यात्रा में अहम योगदान रहा है।