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पान की खेती पर अधिक कर लगाने पर किया था रघुनाथ सिंह ने अंग्रेजों से विद्रोह

स्वतंत्रता दिवस विशेष : आदिवासियों को साथ लेकर अंग्रेजों का किया सामना, महेश्वर में उन्हें दी थी फांसी

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खरगोन

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Manish Geete

Aug 15, 2023

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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में निमाड़ अंचल की जनजाति का योगदान रहा है। क्रांतिकारी राव रघुनाथ सिंह मंडलोई ने भी अंग्रेजों से विद्रोह कर अपना बलिदान दिया था। टांडा बरुड़ सहित आसपास के गांवों में पहले बड़े स्तर पर पान की खेती की जाती थी। अंग्रेजों ने पान की खेती पर कर बढ़ा दिया। इसी के खिलाफ रघुनाथ सिंह ने अंग्रेजों से विद्रोह किया था।

शासकीय महाविद्यालय कसरावद के इतिहास के सहायक प्राध्यापक विजयसिंह मंडलोई ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रघुनाथ सिंह का जन्म ग्राम टांडा बरुड़ बड़ी कचहरी में पटेल परिवार में 1820 में हुआ था। उनके पिता दीवान सिंह उस समय 52 गांव की आदिवासी जमींदार थे। टांडा बरुड़, बिस्टान, ऊन, रोमचिल्ली, देवनलिया आदि गांव पान की खेती के लिए विख्यात थे। खेती की चुंगी का करारोपण इनके पिता दीवान सिंह के हाथों में था। वे पान की खेती करने वाले किसानों से दो प्रतिशत करारोपण लेते थे। गरीब किसानों को कुछ सुविधा देकर करारोपण में छूट दी जाती थी।

तीन हजार क्रांतिकारी थे सेना में शामिल

विरोध से बचने के लिए अंग्रेजों ने रघुनाथ सिंह को राव की उपाधि दी और 35 हजार रुपए माह पेंशन पुरस्कर सहित अन्य सुविधाएं दी। रघुनाथ सिंह ने इसका विरोध कर 1858 में करारोपण नीति के खिलाफ आदिवासी, भील, बारेला, भिलाला आदि के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किया। अंग्रेजों ने रघुनाथ सिंह को पकड़ने के लिए कई रेजिमेंट को लगाया। परंतु उन्हें पकड़ नहीं पाए। उनकी सेना में तीन हजार क्रांतिकारी हो गए थे। अक्टूबर 1858 को उन्हें अंग्रेजों ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया। इंदौर में रखने के बाद महेश्वर जेल में भेजा गया। कुछ समय बार महेश्वर में रघुनाथ सिंह को फांसी दे दी गई। स्थानीय लोगों ने उनके नाम पर स्मारक बनाने की मांग की है।

फांसी बेड़ी पर दी थी फांसी

मंडलेश्वर में नर्मदा नदी किनारे ऐतिहासिक फांसी बेड़ी स्थल का विकास नहीं हो पाया है। इतिहास के जानकार दुर्गेश कुमार राजदीप ने बताया कि क्षेत्र में भी चर्बी वाले कारतूस का विरोध चल रहा था। अंग्रेजों निमाड़ के रॉबिनहुड के नाम से मशहूर भीमा नायक को पकड़ने में नाकाम रहे तो उन्होंने भीमा की मां को यातानाएं देकर मार दिया। इसकी खबर जब भीमा के साथियों को लगी तो उन्होंने तीन जुलाई 1857 को मंडलेश्वर पर आक्रमण कर दिया और किले पर कब्जा कर लिया था। उसके बाद अंग्रेजों की बड़ी फौज ने किले पर फिर से आक्रमण कर यहां से कई क्रांतिकारियों को पकड़कर नर्मदा किनारे जंगल में पेड़ों पर लटकाकर फांसी दी थी।