
जानिए कोलकाता में कहां धूल में भी मिलता है सोना
कोलकाता. कोलकाता के सुनारों के मोहल्ले सिंथी मोड़ में विश्वकर्मा पूजा से पहले कबाड़ में सोना ढूंढना वालों की पूरी फौज आ गई है। आलम यह है कि सुनारों के कमरों की पुरानी चटाइयां, पैरपोछना, लुंगी, गमछा, चादर, गद्दे, दरियां सैकड़ों रुपयों में खरीदी जा रही हैं। उनके कमरों की धूल के भी खरीदार हैं। उनके घरों के बाहर की नालियों में भी सोने के कण तलाशे जा रहे हैं।
सोने के कारीगर बाबलू देवनाथ ने बताया कि हर साल विश्वकर्मा पूजा से पहले उनके कारखानों की साफ सफाई होती है। हर उपकरण, बैठने की जगह से लेकर पूरे कमरे की सफाई की जाती है। जिस कमरे में सोने का काम होता है उसमें छोटे छोटे महीन स्वर्णकण बिखरे रहते हैं। जो कारखाने में काम करने वाले कारीगरों की चटाइयों, दरियों या गद्दे पर चिपक जाते हैं। विश्वकर्मा पूजा से पहले ऐसी पुरानी चीज खरीदने वाले आते हैं। जहां सोने का बारीक काम होता है वहां का सामान ज्यादा कीमतों पर खरीदा जाता है।
पुराने के बदले नया वह भी बिना किसी कीमत के
एक अन्य कारीगर अशोक सांतरा ने बताया कि हर साल विश्वकर्मा पूजा से पहले उसकी दो से तीन पुरानी लुंगी लेकर पुराना सामान खरीदने वाले नई लुंगी दे जाते हैं। पुराने के बदले नया वह भी बिना किसी कीमत के इसलिए विश्वकर्मा पूजा का इंतजार रहता है।
धूल भी बिकती है पांच सौ में
आगरा से बंगाल आकर सुनारों के मुहल्ले में पुराना सामान खरीदने वाले खुर्शीद आलम ने बताया कि वे सुनारों का पुराना सामान खरीदते हैं। धूल भी खरीदी जाती है जिसे महाजन को कमीशन पर दे देते हैं। महाजन के पास लोग हैं जो कचरे, कबाड़ और पुराने सामान में छिपे सोने के कण निकालते हैं। कीमत कैसे तय होती है यह पूछने पर उसने बताया कि वे सामान का निरीक्षण कर कीमत तय करते हैं। पुरानी चटाई की कीमत सौ रुपए से लेकर तीन सौ रुपए, गद्दे की दो सौ से लेकर हजार रुपए तक, दरी तीन सौ लेकर 1 हजार रुपए तक हो सकती है। यहां तक की सौ ग्राम धूल भी कई बार 5 सौ रुपए तक की बिकती है।
Published on:
17 Sept 2019 06:22 pm
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