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बंगाल में होली के दिन दोल उत्सव में दिखती है विविधता

पुरुलिया में ‘पलाश उत्सव’, नबद्वीप में चैतन्य होली और शांतिनिकेतन की ‘रवींद्रिक’ परंपरा का आयोजन कोलकाता. पश्चिम बंगाल में होली रंगों का खेल के साथ ही सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक चेतना का समागम भी है। जहाँ देश के बाकी हिस्सों में ‘धुलेंडी’ की धूम होती है, वहीं बंगाल ‘डोल जात्रा’ के जरिए अपनी एक अलग […]

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पुरुलिया में 'पलाश उत्सव', नबद्वीप में चैतन्य होली और शांतिनिकेतन की 'रवींद्रिक' परंपरा का आयोजन

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में होली रंगों का खेल के साथ ही सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक चेतना का समागम भी है। जहाँ देश के बाकी हिस्सों में 'धुलेंडी' की धूम होती है, वहीं बंगाल 'डोल जात्रा' के जरिए अपनी एक अलग पहचान पेश करता है। राजस्थान की 'गैर' और 'चंग' की तरह पुरुलिया का 'छऊ' और नबद्वीप का 'कीर्तन' भी सामुदायिक एकता का प्रतीक है। जिस तरह मारवाड़ में गांव के चौक पर होली जलती है, वैसे ही बंगाल के इन गांवों में शाम को 'नैड़ा पोड़ा' (होलिका दहन का स्थानीय रूप) किया जाता है। यहाँ की होली में सदियों पुरानी लोक परंपराओं और आध्यात्मिक सादगी का संगम है।

पुरुलिया: जहां पलाश के संग थिरकता है 'छऊ'

पश्चिमी बंगाल का पुरुलिया जिला, जिसे अपनी लाल मिट्टी के लिए जाना जाता है, होली के दौरान 'पलाश' के केसरिया फूलों से लकदक हो जाता है। यहाँ की होली को 'बसंत उत्सव' या 'पलाश उत्सव' के रूप में मनाया जाता है। यहाँ कृत्रिम रंगों का स्थान पलाश के फूलों से बना प्राकृतिक रंग लेता है। गांव के लोग इन फूलों को इकट्ठा कर रंग तैयार करते हैं। पुरुलिया की होली का असली आकर्षण यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त विश्व प्रसिद्ध 'छऊ नृत्य' है। भारी-भरकम मुखौटे पहनकर जब कलाकार 'महिषासुर मर्दिनी' या 'रामायण' के प्रसंगों पर ढोल-नगाड़ों की थाप पर हवा में छलांग लगाते हैं, तो पर्यटक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। शाम होते ही महुआ के पेड़ों के नीचे 'झूमुर' गीतों की महफिल सजती है।

500 साल पुरानी परंपरा का साक्षी : नबद्वीप

नदिया जिले का नबद्वीप, जिसे 'बंगाल का ऑक्सफोर्ड' और चैतन्य महाप्रभु की जन्मस्थली कहा जाता है, यहाँ की होली आध्यात्मिक चरम पर होती है। नबद्वीप की गलियों में आज भी 500 साल पुरानी परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और राधा की मूर्तियों को पालकी में सजाकर निकाला जाता है। इसे 'महाप्रभु का डोल' कहा जाता है। यहाँ की होली का 'कलर कोड' केवल अबीर नहीं, बल्कि 'हरि नाम' है। हज़ारों की संख्या में लोग 'खोल' (मृदंग) और 'करताल' बजाते हुए संकीर्तन करते हैं। यहाँ होली में लोग एक-दूसरे को रंग लगाने से पहले भगवान के चरणों में गुलाल अर्पित करते हैं और फिर 'हरे कृष्ण' बोलकर गले मिलते हैं।

शांतिनिकेतन की सादगी

शांतिनिकेतन एक ऐसा ध्रुव है जो होली के उत्सव को परंपरा और आधुनिकता के एक सूत्र में पिरोता हैं। शांतिनिकेतन अपनी बाउल' संगीत की धूनों से मन को शांत करता है। यहां 'कोपा' (स्थानीय मेला मैदान) परिसर में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारी पुलिस बल और ड्रोन से निगरानी रखी जाती है। होली के दौरान होटलों और आश्रमों की बुकिंग महीनों पहले फुल हो जाती है। राज्य पर्यटन विभाग विशेष बसें और ट्रेनें संचालित करता है। शांतिनिकेतन की सांस्कृतिक शांति बंगाल को होली के नक्शे पर सबसे अलग खड़ा करती हैं। शांतिनिकेतन का 'बसंत उत्सव' प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है। सुबह 'वैतालिक' (प्रभात फेरी) के साथ आश्रम की गलियां गूंज उठती हैं। छात्र-छात्राएं पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ रवींद्र संगीत पर नृत्य करते हैं। यहां की विशेषता 'खोलो द्वार' गान है, जो वसंत के स्वागत का प्रतीक है। इस दौरान स्थानीय कारीगरों का एक छोटे मेले में काथा स्टिच और चमड़े का काम पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है।