
युवा पीढ़ी को अपनी भाषा से जोडऩा जरूरी- पंकज उधास
कोलकाता
मखमली आवाज के दम पर पिछले चार दशक से दुनिया भर के गजल प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले मशहूर गजल गायक पंकज उधास आज भी हर वर्ग के लोगों की पसंद हैं। उनकी आवाज में आज भी वही जादू है, जो पहले था। भारतीय संगीत को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले पद्मश्री पंकज उधास ने रविवार को कोलकाता में राजस्थान पत्रिका संवाददाता आशुतोष सिंह के साथ विशेष साक्षात्कार में मौजूदा दौर में गजल गायिकी के भविष्य, अपने यादगार लम्हे और अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर खुलकर बातचीत की। पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश:
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मौजूदा दौरा में गजल गायिकी का भविष्य:
वर्तमान में गजल के प्रति श्रोताओं का रुझान घटा है। युवा पीढ़ी ऊर्दू और हिन्दी से दूर हो रही है। सभी अंग्रेजी में बोलना पसंद कर रहे हैं। ३०-४० साल के उम्र के लोगों को तो पता है गजल क्या है, लेकिन उससे कम उम्र वालों को इस बारे में कुछ पता ही नहीं है। यह हम सब की जिम्मेदारी है कि युवा पीढ़ी को अपनी भाषा से जोड़ें और गजल के बारे में बताए। इसके प्रति उनमें रुझान बढ़ाएं। गजल गायिकी का इतिहास लगभग ४०० साल पुराना है। इस लम्बी अवधि में कईबार उतार-चढ़ाव आए हैं। उम्मीद है यह तूफान भी छंट जाएगा।
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क्या आप मानते हैं कि वर्तमान दौर में गजल पीछे छूटती जा रही है?
गजलों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें बहुत सी चीजें ऐसी हैं, जो सुकून देती है। अब भी गजल गायकी का उतना ही महत्व है जितना पहले था। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद मुझे लोग कोलकाता में कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए नहीं बुलाते।
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कैरियर का सबसे यादगार लम्हा:
साल १९८६ का मार्च का महीना था। न्यूयार्क के मशहूर ऑडिटोरियम मेडिसन स्क्वायर गार्डन में मेरा कार्यक्रम था। मैंने वहां पहली बार अपनी गजल ''चि_ी आई है...,ÓÓ गाया था। उस समय 'नामÓ फिल्म रीलिज नहीं हुई थी। ऑडिटोरियम में ४६०० श्रोता थे। गाना समाप्त होने के बाद पूरे ऑडिटोरियम में सन्नाटा छा गया। श्रोता एकदम शांत बैठे थे। ४-५ सेकेण्ड तक चारों ओर खामोशी छाई रही। मुझे लगा शायद मेरी गजल श्रोताओं को पसंद नहीं आई। मैं थोड़ा मायूस हो गया, लेकिन तभी एक-एक कर श्रोता अपनी सीट से खड़ा होने लगे और उनकी तालियों की गडग़ड़ाहट से पूरा ऑडिटोरियम गूंज उठा। श्रोताओं की आंखों से अश्रु की धारा बह रही थी। वह लम्हा मेरे जीवन का सबसे यादगार लम्हा है।
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आप गजल गायक नहीं होते तो क्या होते:
इस सवाल पर मुझे गालिब का एक शेर याद आया-
''हजारो ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकलें।... ''
मुझे ईश्वर ने गजल गाने के लिए ही धरती पर भेजा है। कोई गायक बनता नहीं और ना ही कोई किसी को गायक बनाता है। यह एक ईश्वरीय देन है। बचपन में मैं डॉक्टर बनना चाहता था। इसलिए साइंस से पढ़ाई की। क्रिकेट में भी मेरी रुचि थी। अच्छी स्पिन बॉलिंग करता था। अगर गायक न होता तो शायद डॉक्टर या फिर क्रिकेटर होता।
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क्या नए कलाकारों को तराश रहे हैं:
नए कलाकारों को तराशने के लिए खजाना नाम से कार्यक्रम करते हैं। इसमें नए फनकारों का मौका देते हैं ताकि उन्हें मोटिवेशन मिले। देश में टेलेंट की कमी नहीं है। मुंबई मे होने वाले इस टैलेन्ट हंट में प्रतिभागियों की सख्या साल-दर-साल बढ़ रही है।
Published on:
04 Mar 2019 10:49 pm
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