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कोलकाता दुर्गोत्सव : किसानों की हालत से रू-ब-रू कराने मंडप में उतारा उनका जीवन

- थीम : पालक, स्थान : बेहला शाखेरबाजार बडि़शा सार्वजनी दुर्गोत्सव - स्थापना : 1948, बजट : 60 लाख - कमेटी अध्यक्ष : पुलक चटर्जी, कलाकार : गोरांग कुईला

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कोलकाता दुर्गोत्सव : किसानों की हालत से रू-ब-रू कराने मंडप में उतारा उनका जीवन

कोलकाता दुर्गोत्सव : किसानों की हालत से रू-ब-रू कराने मंडप में उतारा उनका जीवन

कोलकाता. भारत हमेशा से कृषि प्रधान देश रहा है। यहां के किसानों ने प्रकृति की रक्षा के लिए अपना खून-पसीना बहाया है। हम भले प्रकृति से मिलने वाले सभी साधनों का उपभोग कर उन्हें भूल जाएं। लेकिन हमारे किसान ऐसा बिल्कुल नहीं करते और बड़े प्यार से उन्हें सींचते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद इस चकाचौंध की जिंदगी में प्रकृति के पालनकर्ता उन किसानों की खबर हम में से शायद ही किसी को है। यहां तक कि सरकार भी उनकी ओर कोई खास ध्यान नहीं दे रही है।

ऐसे में बेहला के बडि़शा सार्वजनी दुर्गोत्सव ने अपने मंडप में किसानों की जिंदगी से रूबरू कराने का प्रयास किया है। देश के किसानों को समर्पित इस मंडप का निर्माण सूखे घास-फूस, अनाजों को खोले, धान की बालियां, व धान-गेहंू के सूखे पौधों से की गई है। यहां पंडाल के निर्माण सूखे गन्ने, सूखे पत्ते आदि का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा खेतों में किसानों के काम आने वाले औजार जैसे कुदाल, खुंती, हसीया, कुल्हाड़ी आदि को लाइटिंग के माध्यम से सजाया गया है।

पूजा पंडाल में मां दुर्गा को किसानों के घर की गृहवधू का रूप देते हुए मातृरूप में दर्शाया गया है। जो गणेश को गोद में लिए मंडप में विराजी हैं। प्रतिमा की खासियत है कि यह काठ व मिट्टी से बनी हुई है और मां रूपी दुर्गा को अस्त्र विहीन रखा गया है। वहीं पंडाल के अलग-अलग हिस्सों में मिट्टी व काठ की मदद से किसानों की मूर्ति बनाई गई है। जिन्हें खेतों में अलग-अलग काम करते हुए दिखाया गया है। वहीं कई जगहों पर किसानों को आंदोलन व आत्महत्या करते हुए दिखाया गया है, जो उनकी वर्तमान स्थिति को दर्शा रहा है।