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18 साल चली प्रक्रिया साढ़े चार करोड़ हुए खर्च तब जाकर छ: दशक में पहली बार ऊर्जाधानी में विद्युतीकृत इंजन से होगा कोल परिवहन

हर महीने सीएसईबी की बचत 80 लाख रूपए

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कोरबा

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Shiv Singh

Mar 23, 2018

हर महीने सीएसईबी की बचत 80 लाख रूपए

हर महीने सीएसईबी की बचत 80 लाख रूपए

कोरबा . विकास में विरोधाभास का उदाहरण देखना हो तो कोरबा आईए यहां सीएसईबी प्लांटों से उत्पन्न बिजली के जरिए देश के कई राज्य भी रोशन होते हैं।

लेकिन महज नौ किलोमीटर का वह फासला जहां से प्लांटों में जान फूंकने वाले कोयले का परिवहन होता रहा है। उस रेल लाइन को अब तक विद्युतीकृत नहीं किया जा सका था। इसके लिए सीएसईबी के अफसरों ने जान लगा दी। व्यक्तिगत संबंध निभाए गए। यह प्रक्रिया 18 साल तक चली साढ़े चार करोड़ रूपए खर्च हुए तब जाकर अब छ: दशक में पहली बार ऐसा अवसर आया है, जब सीएसईबी के प्लांट को डीजल के बजाय विद्युतीकृत रेल इंजन से कोयले का परिवहन होगा।

इस प्रोजेक्ट के लिए दो स्थानों पर रेल लाईन के उपर से गुजरने वाली 33केवी विद्युत की हाई पावर कनेक्शन वाली तारें बड़ी समस्या थी। इसमें से एक सीएसईबी चौक तो दूसरी टीपी नगर फाटक के समीप मौजूद थी। सीएसईबी चौक के समीप स्थित लाईन स्वयं सीएसईबी की थी,

इसलिए इसमें ज्यादा परेशानी नहीं आई लेकिन टीपी नगर स्थित लाईन एसईसीएल की निजी लाईन थी। इसके लिए क्लियरेंस लेने में काफी समय लग गया। क्यिरेंस मिलने के बाद इन दोनो स्थानों पर 33 केवी की लाईन को रेल लाईन के नीचे से अंडरग्राउंड करके दूसरी तरफ ले जाया गया है। इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए सीएसईबी ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे को वर्ष 2005 में साढ़े चार करोड़ रूपए दे दिए थे। जो इस परियोजना की कुल लागत भी है।

30 हजार मीट्रिक टन कोयले का परिवहन रोजाना
बिजली उत्पादन के लिए सीएसईबी को इसी रेल लाईन से रोजाना 30 हजार मीट्रिक टन कोयले का परिवहन किया जाता है। एक तरह से यही रेल लाईन पावर प्लांट की लाईफलाइन है। जिसके जरिए कोयले की अपूर्ति होती है। कोलये के बिना बिजली का उत्पादन असंभव है। कोयले की आपूर्ति कुसमुंडा खदान से होती है।


हर माह 3 से 4 व्हील बर्न
डीजल इंजन की क्षमता कम होने के करण कोयला परिवहन के दौरान ट्रेन की रफ्तार बहुत कम रहती है। कई बार तो ट्रेन बीच रास्ते में ही खड़ी हो जाती। ट्रेन के पहिए एक ही स्थान पर घूमते रहते हैं, लेकिन ट्रेन आगे नहीं खिसकती। इससे पटरियों को काफी नुकसान पहुंचता है। पटरी और ट्रेन के पहिये के घर्षण से पटरियां जल जाती हैं और उसमें गड्ढे हो जाते हैं। इसे ही व्हील बर्न कहा जाता है। महीने में तीन या चार बार व्हील बर्न से पटरियों को पहुंचे नुकसान की मरम्मत करनी पड़ती है। जिसमें हर बार लगभग चार लाख रूपए खर्च होते हैं। केवल व्हील बर्न से महीने के 12 लाख रूपए मरम्मत के तौर पर खर्च होते हैं। रेल लाईन के विद्युतीकृत होते ही व्हील बर्न की समस्या भी दूर हो जाएगी।


डीजल से परिवहन में हर माह का खर्च 70 लाख
सीएसईबी की लाईन के विद्युतीकृत नहीं होने के कारण कोयला खदान से रेलवे स्टेशन स्थित रेल यार्ड तक कोयले का परिवहन इलेक्ट्रिक इंजन से किया जाता है। इसके बाद यार्ड में इलेक्ट्रिक इंजन को निकालकर कोयले से लदी मालगाड़ी में डीजल इंजन फिट किया जाता है। इसके बाद ही शहर की साढ़े तीन किलोमीटर के फासले के अलावा प्लांट के अंदर का फासला भी डीजल इंजन के जरिए ही तय किया जाता है। इस दौरान यार्ड में खड़ी इलेक्ट्रिक इंजन के स्टैण्डबाई और डीजल का खर्च सीएसईबी को ही वहन करना पड़ता है। इसके हर माह का खर्च 70 लाख रूपए है। इसमें व्हील बर्न वाला खर्च जोडऩे पर यह खर्च बढ़कर 80 लाख रूपए से भी ज्यादा है। विद्युतीकृत रेल लाईन के जरिए कोयले का परिवहन शुरू होते ही से यह 80 लाख रूपए हर महनी की शुद्ध बचत होगी।


आधे शहर की टै्रफिक समस्या के लिए उत्तरदायी यह रेल लाईन
सीएसईबी ने अपनी रेल लाईन को विद्युतीकृत कर लिया है। अब इसी के समकक्ष बालको और केटीपीएस की रेल लाईन भी गुजरती है। इन्हें भी डीजल इंजन के साईड इफेक्ट झेलने पड़ रहे हैं। रेललाईन टीपी नगर से होकर गुजरती है। बालको और केटीपीएस की रेल लाईन को भी विद्युतीकृत कर दिया जाए तो आधे शहर की बड़ी परेशानी हल हो जाएगी। बहरहाल फिलहाल सीएसईबी की लाईन विद्युतीकृत होने से भी शहर को काफी हद तक राहत मिलेगी। तो दूसरी तरफ बालको द्वारा भी अपनी लाइन को विद्युतीकृत का प्रयाय किया जा रहा है जबकि केटीपीएस के पास अब तक ऐसी कोई योजना नहीं है। यहां ट्रेन रूकने व बार-बार फाटक बंद रहने दिन में कई बाद ट्रैफिक जाम की समस्या होती है।


इतनी बिजली का उत्पादन होता है पावरसिटी में
कोरबा जिले में वर्तमान में एनटीपीसी संयंत्र से 2600 मेेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। कोरबा के जमनीपाली में 500-500 मेगावाट की चार और 200- 200 मेगावाट की तीन इकाइयां स्थापित हैं। छत्तीसगढ़ बिजली कंपनी ने कोरबा में 50- 50 मेगावाट की चार, 210 मेगावाट की दो, 210 मेगावाट की चार, 500 मेगावाट की एक और 250 मेगावाट की दो यूनिट का निर्माण किया है। बांगो का हाईडल पावर प्लांट इससे अलग है।


फैक्ट फाइल
लागत- 4.5 करोड़
कुल लंबाई- 9.2
प्रक्रिया शुरू- 2005
जिले में कोयला उत्खनन प्रारंभ- 1960
प्लांट की स्थापना हुई- 1958
विद्युतीकृत लाइन होने से अब हर महीने की बचत- 80-90 लाख/माह

विद्युतीकृत होने से 70 से 80 लाख रूपए प्रति माह की बचत
रेलवे स्टेशन से टीपी नगर होते हुए प्लांट के अंदर आने वाली रेल लाईन से अब विद्युत इंजन से कोल परिवहन होगा। सीएसईबी की यह पहली विद्युतीकृत रेल लाइन है। विद्युतीकृत होने से 70 से 80 लाख रूपए प्रति माह की बचत होगी। इसकी प्रक्रिया 2005 में शुरू हुई थी। इस मार्ग से 30 हजार मीट्रिक टन कोयला रोजाना परिवहन किया जाता है।
-अब्दुल वाहिद, ईई सीएसईबी