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यहां प्रदूषण से खतरे में है जीवन इस तरह घर के आंगन तक प्रवेश कर रहा काला जहर

नागरिक समय-समय पर जिला प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन से गुहार लगाते हैं बात अनसुनी

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कोरबा

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Shiv Singh

Mar 17, 2018

pollution in korba

नागरिक समय-समय पर जिला प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन से गुहार लगाते हैं बात अनसुनी

कोरबा . प्रदूषण से कराह रहे दीपका में जनजीवन पूरी तरह से धूल-धुआं और गुबार में फंस गया है। अधिक कोल उत्खनन और परिवहन पर जोर दिया जा रहा है लेकिन इस पूरे काराबोर में कोल इंडिया व एसईसीएल प्रबंधन पर्यावरणीय मानकों का कतई ख्याल नहीं रख रहें हैं। काफी लंबे अरसे से दीपका के जागरूक लोग प्रदूषण की समस्या को लेकर अपना विरोध जताते आ रहे हैं लेकिन समाधान नहीं हो रहा है। शुक्रवार को दोपहर दो बजे दीपका थाना चौक में स्थिति बेहद बुरी हो गयी। बड़ी संख्या में ट्रक खुल में कोल परिवहन कर रहे थे और पुलिस उनके लिए रास्ता बना रही थी। कोयले की डस्ट से धुंध बन गयी और इसी में लोग अपना रास्ता तलाशने के लिए मजबूर थे। प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए नागरिक समय-समय पर जिला प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन से गुहार लगाते हैं बात अनसुनी है।


ढाबा-चाय दुकान भी चपेट में
कोल उत्खनन व परिवहन में लगे लोगों के चाय,नाश्ता और खाने-पीने के लिए बड़ी संख्या में दीपका थाना चौक से लेकर आसपास के क्षेत्र में कई ढाबे और चाय की दुकानें खुली हुईं हैं। इनमें तैयार की जाने वाली खाद्य सामग्री पर भी डस्ट का जमाव रहता है। दुकानदार भी खाद्य सामग्री को नहीं ढकते हैं।

पुलिस भी वाहनों के लिए बनाती है रास्ता
अनियन्त्रित वाहनों पर लगाम कसने के बजाय पुलिस इनकी मदद करती है। तेज गति से वाहन चौक पर आवागमन करते हैं। इसी चौक से दोपहिया,हलके चार पहिया वाहन और साइकिल सवार से लेकर पैदल तक जाते हैं लेकिन पुलिस को इन लोगों के सुरक्षित आवागमन की चिंता नहीं है।

पेड़-पौधों व जीवों पर विपरीत प्रभाव
प्रदूषण की चपेट में आने से न केवल इंसान का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि दीपका और आस पास के क्षेत्र में वनस्पतियां भी विकसित नहीं हो रही हैं। दीपका थाना चौक और गौरव पथ के किनारे लगे पेड़ों के फूल-पत्तियां पूरी तरह से पुराने आकार को छोड़ चुकी हैं। जीवों के रहने के स्थान भी सिमटते जा रहे हैं।

न्यूट्रल फोरम का गठन होना चाहिए
2016 में जो नियम बने हैं, उनके अनुसार प्रदूषण के लिए उत्तरदायी औद्योगिक सस्थान हैं। उन्हीं द्वारा इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। जिले में यदि वास्तव में प्रदूषण का नियंत्रण में लाना है, तो कलेक्टर की अध्यक्षता में एक न्यूट्रल फोरम का गठन होना चाहिए। जिसमें डॉक्टर, इंजीनियर, मीडिया, प्रोफेसर आदि को शमिल करना होगा। इसी कमेटी द्वारा प्रदूषण के कारकों का पता लगाकर अनुशंसा करनी होगा। काम कौन करेगा इसका निर्धारण व क्रियान्वयन भी सख्ती से कलेक्टर द्वारा कराया जाना चाहिए।
-वाईके सोना, पर्यावरणविद्