
हाथियों को करतला के तीन रेंज के साथ ही आसपास के जंगल पसंद आने लगे हैं।
राजकुमार शाह/कोरबा. हाथियों को करतला के तीन रेंज के साथ ही आसपास के जंगल पसंद आने लगे हैं। 90 के दशक में हाथियों का परिवार या दल इन क्षेत्रों में केवल घूमने आया करता था और भोजन के बाद लौट जाता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
शुक्रवार को हाथियों के दो अलग-अलग दल कोरकोमा के समीप आमाडांड और ढेंगुरडीह के बीच के जंगलों में दिखाई दिए। दोनों दलों के एक हो जाने की लाईव रिपोर्टिंग पत्रिका ने की। इस दौरान हाथियों के दो दलों को मिलाकर उनकी संख्या लगभग 50 थी।
कोरकोमा के करीब जंगल के कंपार्टमेंट नंबर 1004 में हाथियों के मौजूद होने की सूचना थी। वनकर्मी भी यहां तैनात थे, जो नियमित पेट्रोलिंग कर हाथियों की सही लोकेशन की जानकारी एकत्र कर ग्रामीणों को जंगल में जाने से रोकने का काम करते हैं। वनकर्मी बीके शुक्ला, आशीष पटेल, उर्मिला मार्काे आदि हाथियों की लोकेशन पता करने के लिए जंगल के भीतर जा रहे थे।
पत्रिका की टीम ने भी वनकर्मियों के साथ जंगल के भीतर का सफर किया। घने जंगल के बीच हाथियों के चिंघाडऩे की आवाज आने लगी थोड़ा और आगे जाने पर कोरकोमा और रजगामार के जंगलों में हाथियों का दल दिखाई दिया जिनकी संख्या 30 से 40 के बीच थी। इसके बाद वहांं से मुख्य मार्ग पर पहुंचते ही, हाथियों का एक और दल विपरीत दिशा से आया।
सड़क के करीब आते ही मुख्य मार्ग पर लोगों की भीड लग गई। जिससे हाथी थोड़े असहज हो गए। उन्हें सड़क के दूसरी तरफ जाना था। सड़क पार करने से पहले दल का मुखिया सूंड उठाकर चिंघाड़ते हुए एक तरह से रेकी करने सड़क के करीब आया। जिससे वहां फोटो और वीडियो बना रहे लोग भाग खड़े हुए। कुछ ग्रामीण तो सड़क पर वाहन छोड़कर भाग गए।
इसके बाद हाथियों के दल ने आमाडांड और ढेंगुरडीह के बीच दौड़ते हुए रोड क्रॉस किया। इस दल में हाथियों की संख्या लगभग 20 थी। जंगल के अंदर और रोड क्रॉस करने वाले दोनों ही दलों में नन्हें हाथियों की तादात काफी ज्यादा थी। शुक्रवार को करीब शाम के 4 बजे हाथियों के दो अलग-अलग दल एक साथ मिले जोकि ढेंगुरडीह से कोरकोमा की ओर आगे बढ़ गए।
हाथियों को घना जंगल और खाने का स्वाद खींच रहा
करीब 52 हाथियों का एक परिवार इस समय कोरबा वनमंडल के जंगलों में विचरण कर रहा है। अब लगभग यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि करतला व इसके आसपास के इलाके हाथियों का स्थाई रहवास बन चुका है। हाथियों का परिवार उसी दिशा में सफर करता है।
जहां उन्हें खाना और पानी मिलता है। करतला में जंगल का घनत्व व इसके समीप उगे धान व कटहल के पेड़ हाथियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। कटहल हाथियों का मनपसंद फल होता है। जिसे वह 10 किलोमीटर दूर से भी सूंघ लेते हैं।
अब से एक या दो दशक पहले तक हाथी कोरबा वनमंडल में आते थे और फिर कुछ देर ठहरने के बाद लौट जाते थे। लेकिन ओडिशा और झारखंड में खदानों के विस्तार के बाद वहां के जंगल का रकबा कम हो गया। इसलिए हाथी करतला की ओर बड़ी तादात में डायवर्ट हुए अब तो इसे उन्होंने अपना घर बना लिया है। अकेले करतला के तीन रेंज का क्षेत्रफल 1246 हेक्टेयर है।
वन अमले के लिए चुनौती
हाथियों को संभालना वन अमले के लिए बेहद चुनौती भरा हो गया है। खासतौर पर तब जब हाथी यहां स्थायी तौर पर रहने लगे हैं। वन विभाग के पास इसके लिए कोई ठोस तैयारी नहीं है। वनकर्मियों के पास वायरलेस वॉकी तक नहीं है। जंगलों में मोबाईल का नेटवर्क भी साथ छोड़ देता है।
वन अमले की सबसे बड़ी परेशानी यह भी कि आदिवासी बेल्ट होने के कारण लोग अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर आश्रित होते हैं। हाथी प्रभावित क्षेत्र के प्रत्येक ग्रामीण को इसकी जानकारी होती है कि हाथियों की लोकेशन अभी कहां है। बावजूद इसके हाथियों के आमने-सामने होने वाली परिस्थतियों पर लगाम नहीं लग रहा है।
-यह कहना गलत नहीं होगा कि अब करतला व इसके आस-पास के जंगल हाथियों के स्थाई रहवास हो चुके हैं। पड़ोसी राज्यों में खदानों के विस्तार से ऐसी परिस्थतियां निर्मित हुई हैं। कोशिश यही रहती है कि ग्रामीणों को वक्त रहते हाथियों की लोकेशन बताकर एलर्ट किया जाए। लेकिन मनाही के बाद भी ग्रामीण जंगल जाते हैं।
-मनीष कश्यप, एसडीओ, वन करतला
Published on:
07 Jul 2018 10:50 am
बड़ी खबरें
View Allकोरबा
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
