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Employee News : एसईसीएल से तीन साल में इतने हजार कर्मी सेवानिवृत्त, फिर भी किया रिकार्ड उत्पादन, ये है वजह…

- मार्च 2017 की स्थिति में कोयला खदान में नियमित कर्मचारी 61 हजार 209 थे

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कोरबा

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Shiv Singh

Jul 31, 2018

एसईसीएल से तीन साल में इतने हजार कर्मी सेवानिवृत्त, फिर भी किया रिकार्ड उत्पादन, ये है वजह...

एसईसीएल से तीन साल में इतने हजार कर्मी सेवानिवृत्त, फिर भी किया रिकार्ड उत्पादन

कोरबा. कोल इंडिया की सबसे बड़ी अनुषांगिक कंपनी एसईसीएल में नियमित कर्मचारियों की संख्या लगातार घट रही है। औसत तीन हजार नियमित कर्मी हर साल सेवा निवृत्त हो रहे हैं। इससे कंपनी का मेन पॉवर तेजी से घट रहा है। वर्तमान में एसईसीएल के अधीन ५७ हजार ९२१ कर्मचारी कार्यरत हैं।

३१ मार्च, २०१५ की स्थिति में एसईसीएल के अधीन ६७ हजार ८०० कर्मचारी अलग अलग कोयला खदान और दफ्तर में काम करते थे। मार्च २०१६ तक कर्मचारियों की संख्या घटकर ६४ हजार ५०५ हो गई। मार्च २०१७ की स्थिति में कोयला खदान में नियमित कर्मचारी ६१ हजार २०९ थे। वर्तमान में नियमित कर्मचारियों की संख्या ५७ हजार ९२१ पहुंच गई है। यानी मार्च २०१५ से लेकर अभीतक एसईसीएल में नौ हजार ८७९ कर्मचारी सेवा निवृत्त हो चुके हैं।

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एक तरफ कंपनी में नियमित कर्मचारी कम हो रहे हैं। दूसरी तरफ उत्पादन के क्षेत्र में कंपनी नया आयाम गढ़ रही है। समाप्त हुए वित्तीय वर्ष २०१७- १८ में कंपनी ने १४४. ७१ मिलियन टन कोयले का उत्पादन किया है। चालू वित्तीय वर्ष में कंपनी के समक्ष १६७ मिलियन टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य है। लगातार कम हो रही मेन पॉवर के बीच लक्ष्य को हासिल करना कंपनी के लिए बड़ी चुनौती है।

इसकी प्राप्ति के लिए कंपनी ने आउट सोर्सिंग का सहारा लिया है। कंपनी मिट्टी खनन से लेकर कोयले के उठाव तक का काम आउट सोर्सिंग से करा रही है। इससे ंकंपनी को नुकसान नहीं है। लेकिन आउट सोर्सिंग की सबसे अधिक कीमत ठेका मजदूर चुका रहे हैं। उन्हें कोल इंडिया द्वारा निर्धारित मजदूरी नहीं मिल रही है।

पांच साल में 2091 को अनुकंपा नौकरी
कंपनी में नॉन एक्जक्यूटिव कर्मचारी की भर्ती बंद है। अनुकंपा या मेडिकल अनफिट होने वाले कर्मचारियों के आश्रित को ही नौकरी मिल रही है। पहली अप्रैल २०१४ से मई १८ तक कंपनी ने दो हजार ९१ उम्मीदवारों को अनुकंपा नौकरी दी है।

-नियमित कर्मचारियों के सेवा निवृत्त होने से कंपनी आउट सोर्सिंग पर काम ले रही है। लेकिन इसकी सबसे अधिक कीमत ठेका मजदूर चुका रहे हैं। उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल रही है- लक्ष्मण चंद्रा, अल्टरनेट मेम्बर, जेबीसीसीआई