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मानव जीवन की रक्षा के लिये पृथ्वी का संरक्षण जरूरी : नवरंग

- जल,जंगल व जमीन की बदहाली पर विचार मंथन और गोष्ठी का आयोजन

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कोरबा

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Shiv Singh

Apr 23, 2018

मानव जीवन की रक्षा के लिये पृथ्वी का संरक्षण जरूरी : नवरंग

कोरबा . छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए सतत कार्य करने वाली संस्था "सिरजन" के कलमकारों द्वारा विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर जल,जंगल,जमीन की बदहाली पर विचार मंथन और गोष्ठी का आयोजन संस्था के सचिव जीतेन्द्र वर्मा के निवास में किया गया।
इस अवसर पर समिति के प्रांतीय संरक्षक छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ गजलकार, कवि डॉ. माणिक विश्वकर्मा नवरंग ने प्रकृति की यथास्थिति पर दुख प्रकट करते हुये कहा कि पृथ्वी विनाश की ओर बढ़ रही है। मानव जीवन की रक्षा के लिये पृथ्वी का संरक्षण जरूरी है। आज पर्यावरण को खतरा मानव से अधिक हो गया है। साथ ही उन्होंने "कोनो नइहे बैसाखी के मितान"कविता के माध्यम से लोगों को प्रकृति की सुरक्षा से जुड़कर रहने का आह्वान किया।

इसी क्रम में ओज कवि लोकनाथ ललकार ने लोगों को ललकारते हुए कहा कि मानव ने जिसे भी माँ कहा उसका विनाश ही किया,चाहे गौ माता हो,गंगा मैया हो,भारत माता हो,धरती माता हो या जन्म देने वाली मां ही क्यों न हो। "का होगे हिंदुस्तान रे" कविता के माध्यम से आज की प्राकृतिक और सामाजिक स्थिति पर भाव पूर्ण कविता पाठ किया। कोरबा के सुमुधर गीतकार कवि इकबाल अंजान ने सुमुधर आवाज में "मैं तो माटी के बेटा आँव "शीर्षक से मनुष्य के बालपन से लेकर मरते तक माटी के साथ जुड़ तमाम पलों का अच्छा वर्णन किया।

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संस्था के अध्यक्ष कवि लाल जी साहू ने "चलो जंगल जल जमीन बचाबो"नामक कविता पढ़कर समाज को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर कवयित्री सुधा देवांगन ने "गँवागे गँवागे गँवागे, मन के मयना के चैना गँवागे" शीर्षक से सुमधुर गीत प्रस्तुत कर श्रृंगारिक समा बाँधी और विचार मंथन करते हुए बोली कि पेड़ भले न लगाओ पर जो है, उसे कटने न दे। साथ ही शशि साहू ने जंगल के जीवों का शहर, गाँव तक पहुँचने की बातों को उजागर करते हुए "बादर के पंछा ले मुँह झन ढाँकव सुरुज देव" नामक कविता की प्रस्तुति दी।

कवि अजय सागर गुप्ता ने भगवान बाला जी के महिमा गान किया। कवि भूपेंद्र देवांगन ने हास्य रस में "महुँ बनहूँ करोड़पति"कविता प्रस्तुत किया। युवा कवि धरम साहू ने बंटवारा नामक कविता सुनाकर कार्यक्रम का आगाज किया। जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया ने कहा कि मनुष्य को जीवन जीने के लिए मिट्टी से जुड़कर रहना होगा पर आज मानव माटी से दूर होकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे है।"असो भारी गर्मी करत हे देख तो"कविता के माध्यम से खैरझिटिया ने तपती धूप,पानी की कमी का वर्णन किया। सिरजन समिति के उपाध्यक्ष डॉ गिरिजा शर्मा ने बर बिहाव सम्बन्धी उत्कृष्ट रचना पाठ की,और अंत में सभी कवियों के सारगर्भित चिंतन और उम्दा काव्य प्रस्तुति के लिए आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन जीतेन्द्र वर्मा ने किया।