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इन सरकारी स्कूलों में लगती है स्मार्ट क्लास, हौसलों से दे रहे हैं ऊंची उड़ान

गर्मी की छुट्टिया खत्म, नया शैक्षिक आज से
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कोरबा

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Shiv Singh

•

Updated: 18 Jun 2018, 12:37 AM IST

इन सरकारी स्कूलों में लगती है स्मार्ट क्लास, हौसलों से दे रहे हैं ऊंची उड़ान

इन सरकारी स्कूलों में लगती है स्मार्ट क्लास, हौसलों से दे रहे हैं ऊंची उड़ान

कोरबा. सरकारी स्कूलों का नाम सुनते ही दिमाम में सबसे पहले जर्जर भवन और टाटपट्टी पर बैठे संसाधनविहीन बच्चों की तस्वीर कौंध जाती है। लेकिन इस शिक्षण सत्र की शुरूआत पर हम आपको जिले के दो ऐसे स्कूलों से रूबरू करवाएंगे जहां बच्चों की पढ़ाई स्मार्ट क्लास से होती है। बच्चे कंप्यूटर व प्रोजेक्टर के माध्यम से नए प्रयोग करते हैं। यहां बच्चों का भविष्य गढऩे के लिए वह होता है, जो किसी रिहायशी और शहरों के बड़े बैनर के स्कूलों में किया जाता है। यह सब संभव हुआ है, इन स्कूलों के शिक्षकों की इच्छाशक्ति से। सीमित संसाधनों में इन दो युवा शिक्षकों ने बदलाव का रास्ता चुना।

बदलाव ऐसा कि 37 साल बाद गांव के छात्र ने प्रथम श्रेणी में पास की मैट्रिक
जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर पोड़ी उपरोड़ा विकासखण्ड में स्थापित है माध्यमिक शाला अमहवा। जहां के रास्ते बेहद दुर्गम हैं। एक बड़ा नाला पार करने के बाद ही स्कूल पहुंचा जा सकता है। जहां वर्ष 2010 से शिक्षक पंचायत अजय कुमार सिंह पदस्थ हैं। शुरूआत में अजय को काफी परेशानी हुई लेकिन फिर इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अजय अब राज्य के एसीईआरटी के मास्टर ट्रेनर हैं। शिक्षकों के लिए आयोजित कई राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला में भी वह शिरकत करते रहते हैं। अमहवा में अजय ने बदलाव की शुरूआत अपनी पदस्थापना के बाद से ही कर दी थी। जिसका परिणाम यह रहा कि अमहवा में पूरे 37 साल बाद किसी बच्चे ने हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की है। माध्यमिक शाला अमहवा मे अजय ने अपने खर्चे पर कंप्यूटर लगाया। इसके बाद छोटे-छोटे टीचिंग टूल्स आदि एकत्र किए। बच्चों को रोचक ढंग से शिक्षा देने लगे। ख्याति बढने लगी। हाल ही अजय के स्कूल के राज्य के दिशा प्रोजेक्टर के तहत राज्य भर के 80 स्कूलों मे शामिल किया था। जब दिशा प्रोजेक्टर की मुंम्बई से आई टीम स्कूल का निरीक्षण करने पहुंची तब अजय ने एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। इस दौरान जब टीम के सदस्य कम्प्यूटर रूम में पहुंंचे तब बच्चों को कम्प्यूटर चलाने को कहा। टीम सोंच रही थी बच्चे कम्प्यूटर चालू-बंद करके बता दें तो बहुत है। लेकिन जब उन्होंने बच्चों को जियोजेबरा सॉफ्टवेयर पर गणित के एनिमेशन, वर्ड, एक्सेल के फार्मूले और पावर प्वाईट में काम करते देखा तब वह अवाक रह गए। वह दंग थे कि इतने अंदरूनी क्षेत्र के माध्यमिक शाला के बच्चों को इतनी जानकारी है।
टीम इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने माध्यमिक शाला अमहवा को एक प्रोजेक्टर गिफ्ट किया। विडंबना यह है कि अब भी स्कूल पहुंचने का मार्ग बेहद दुर्गम प्रशासन द्वारा इतने सालों में इस समस्या को दूर नहीं किया जा सका है।

कभी बच्चे नहीं आते थे अब छुट्टियों में भी क्लास
जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर अजगरबहार ग्राम पंचायत के प्राइमरी स्कूल गढ़कटरा किसी प्ले स्कूल से कम नहीं है। एक समय यहां के हालात ऐसे थे कि बच्चे सप्ताह में 2-3 दिन स्कूल ही नहीं आते थे। बच्चों को स्कूल से लगाव हो, इसके लिए शिक्षक श्रीकांत सिंह ने नायाब तरीका ढूंढा उन्होंने बदलाव लाने की ठानी और अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए। स्कूल को क्लीन स्कूल ग्रीन स्कूल बनाने के साथ ही कबाड़ मटेरियल से कई प्रयोग किये। शिक्षक श्रीकांत ने बच्चों को गणित सिखाने के लिए जोडऩे घटाने की मशीन बनाई है इससे वह बच्चों को आसानी से गणित सिखा देते हैं। स्कूल में पर्यावरण की जानकारी के लिए हर्बल गार्डन बनाया। गढ़ कटरा के शिक्षक श्रीकांत ने बच्चों को अपने खर्चे पर स्मार्ट क्लास दिया है। स्मार्ट क्लास से बच्चों की पढ़ाई के प्रति रुचि भी बढ़ती जा रही है। श्रीकांत के पिता भी इसी स्कूल में पदस्थ थे। जिनके देहांत के बाद उन्हें यहीं अनुकंपा नियुक्ति मिली। इसलिए स्कूल से उनका भावनात्मक जुड़ाव भी है। श्रीकांत की मानें तो उन्होंने अब तक 80 हजार रूपए स्कूल पर खर्च कर दिए हैं। स्कूल में बदलाव देखकर आब सामाजिक संगठन की मदद के लिए आगे आ रहे हैं।