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हर साल इस मजार पर पहले ऊं लिखी चादर चढ़ाने के पीछे ये है मान्यता, आप भी जानिए

हर साल देखने को मिलता है हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐसा दृश्य, सोनहत के बाबा भोलनशाह का मजार है सर्वधर्म एकता का प्रतीक

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सोनहत. सर्वधर्म एकता की मिसाल यदि देखना है तो कोरिया जिले के सोनहत में आइए। शनिवार से यहां उर्स शुरु हो रहा है। यहां स्थित बाबा भोलनशाह के मजार में आयोजित सालाना उर्स के पहले दिन ग्रामीणों ने सद्भावना गीत के बीच ऊं लिखी चादर का नगर भ्रमण कराया और चादरपोशी की रस्म निभाई।

इसके बाद मुस्लिम समाज द्वारा चादर चढ़ाई गई। ऊं लिखी चादर चढ़ाने के पीछे मान्यता है कि यादव समाज के एक व्यक्ति के कोई संतान नहीं होने पर इस स्थल पर पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगी थी। फिर उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसके बाद उसने यहां मजार बनाया था। तब से यह परंपरा चली आ रही है।


सोनहत उर्स कमेटी ने तीन दिवसीय सालाना उर्स का आयोजन किया है। कार्यक्रम के पहले दिन शुक्रवार रात को सामाजिक सदभाव देखने को मिला। सोनहत क्षेत्र के ग्रामीणों ने मिल-जुलकर सद्भावना गीतों के बीच ऊं लिखी चादर को नगर में भ्रमण कराया और बाबा भोलनशाह की मजार पर चढ़ाया।

इसके बाद उर्स कमेटी बैकुंठपुर सोनहत ने अपनी चादर चढ़ाई। कार्यक्रम में शनिवार और रविवार को शानदार कव्वाली का मुकाबला रात भर चलेगा। ग्रामीणों का कहना है कि भोलनशाह का मजार सर्व धर्म की एकता का प्रतीक माना जाता है।

पिछले कई साल से हिंदू-मुस्लिम समाज द्वारामिल-जुलकर उर्स मनाया जाता है। सोनहत में उर्स के दौरान भारी भीड़ रहती है। इसे देखते हुए जिला प्रशासन द्वारा भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है।


बुजुर्गों ने मजार का बताया इतिहास
बाबा भोलनशाह के मजार का कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है, लेकिन सोनहत के बड़े बुजुर्गों, मजार के मुजावर एवं पुजारियों के अलावा स्व. रामदेव यादव के परिवार के अनुसार मजार का इतिहास काफी ऐतिहासिक है।

सोनहत विकासखंड के केशगवां निवासी ज्योतिषि स्व. श्यामकरण दुबे के पुत्र वाल्मिक प्रसाद दुबे जो किवनस्थली सेवा समिति के संस्थापक भी है और पुरातात्विक स्थलों के विशेष जानकार है। उनके अनुसार रियासत काल के समय जब राजा अमोल सिंह का शासन अंतिम समय में था, उसी समय से बाबा भोलनशाह की पूजा शुरू हुई थी।


यादव परिवार की चढ़ती है पहली चादर
श्यामाधार यादव ने बताया कि उनके दादा रामदेव यादव बनारस से आए थे और अविभाजित सरगुजा एवं वर्तमान में सोनहत और सूरजपुर जिले की सीमा पर स्थित ग्राम किरवाही में रह कर व्यापार करते थे। उनकी कोई औलाद नहीं थी और उन्होंने उक्त स्थान पर पूजा-अर्चना कर पुत्र रत्न की प्राप्ति की मन्नत मांगी थी।

इसके बाद उन्हे पुत्र रत्न प्राप्त हुआ था। इससे वहां पर यथाशक्ति मजार का निर्माण कराया और उसके बाद से आज तक हर साल सालाना उर्स के मौके पर पहली चादर उनके परिवार की चढ़ाई जाती है और उसके बाद कमेटी की चादरपोशी होती है।


1970 में उर्ष शुरू हुआ, परंपरा आज भी कायम
बुजुर्गों का कहना है कि पार्क परिक्षेत्राधिकारी सोनहत निवासी स्व. आरयू पाण्डेय द्वारा मजार पर मन्नत मांगी गई थी और उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। इससे सोनहत एवं बैकुन्ठपुर के ग्रामीणों के साथ बाबा के मजार स्थल पर सालाना उत्सव मनाए जाने का निर्णय लिया गया और उनकी अगुवाई में सन 1970 में पहली बार सालाना उर्स का कार्यक्रम शुरू कराया गया था।

मजार में धीरे धीरे सुविधाएं बढऩे लगी और सन् 1990 से 1995 के आस-पास पुरानी मजार का जीर्णोंधार कराया गया था। इसमें नया मजार एवं कुआं समेत अन्य निर्माण शामिल है।

नव निर्माण में बैकुंठपुर से उर्स कमेटी, श्याम ट्रांसपोर्ट शिवशक्ति ? ट्रांसपोर्ट, सोनहत के ग्रामीण सहित सूरजपुर, विश्रामपुर अंबिकापुर के व्यापारियों ने सहयोग किया। वहीं 2010 में बैकुेंठपुर कमेटी के तत्वावधान में मजार का पुन: विस्तार किया गया है। इसमें मजार के अगल-बगल और सजावटी कार्य कराए गए हैं।

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