
Akhil Bhartiya Mushaira
दशहरे मेले मेंं बुधवार रात विजयश्री रंगमंच पर अखिल भारतीय मुशायरे का आयोजन किया गया। देशभर से आए ख्यातनाम शायरों ने एक से बढ़कर एक कलाम पेश कर खूब वाह वाही बटोरी। शायरी के जरिए व्यंग्य के बाण छोड़ श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। शायरों ने देश के वर्तमान हालात की ओर ध्यान खींचा।
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औलाद को पत्थर नहीं ढोने दूंगी
'मैं हूं मजदूर की बेटी, यह कसम है मेरी, अपनी औलाद को पत्थर नहीं ढोने दूंगी..., यह देश है मेरा, नफरत के बीज नहीं बोने दूंगी..., अमरोही से आई शायरा नीकत अमरोही ने जैसे ही यह शेर पेश किया तो सीधे लोगों के दिलों को छू गया और श्रोताओं ने जमकर दाद दी। रुड़की से आए शायर सिकन्दर हयाब गड़बड़ ने 'खुद पापों को धोने वाली थैली कैसे हो गई, अमृत जैसी धार थी, अब विषैली कैसे हो गई, रोज नहाते नेता- पुलिस, फिर पूछते गंगा मैली कैसे हो गई.., कलाम पेश किया तो लोगों ने जमकर दाद दी। शाहाजापुर के हनीफ राही ने 'हे हकीकत या आंखों का धोखा, एक ही ख्वाबों को कई रातों को देखा..., पंकज पलाश ने 'सब भाई घर को छोड़ गए, मैं अपनी मां के साथ रहा...।
मजदूर को सलाम किसी ने नहीं किया
श्योपुर से आए तालिब तूफानी ने 'गमों की रात का अपना मजा, मियां बरसात का अपना मजा, गुलाबों से मुलायम उसके लफ्जे, अधूरी बात का अपना मजा..., कोटा के चांद शेरी ने 'कश्मीर हमारा है, हमारा ही रहेगा..., सुनाकर ने देर रात तक मुशायरे में समां बांधे रखा। रामपुर से आए ताहिर फ रार ने 'बहुत खूब सूरत हो तुम, अंबर की ये ऊंचाई धरती की यह गहराई तेरे मन में है समाई' सुनाकर माहौल में रस घोला। भोपाल के विजय तिवारी ने 'सदियों से ये काम किसी ने नहीं किया, मजदूर को सलाम किसी ने नहीं किया, भूखों पर सियासत तो सबने की मगर रोटी का इंतजाम किसी ने नहीं किया.., की प्रस्तुति देकर व्यवस्था पर कटाक्ष किया। लखनऊ से आई डॉ. नसीम निखत ने 'जो हम पे गुजरी है जाना तुम्हें बताएं क्या, ये दिल तो टूट गया हम भी टूट जाएं क्या... शायरी पेश की। मंचासीन कई अन्य शायरों ने अपने शायरी व कलामों से दर्शकों को देर रात तक बांधे रखा। संचालन जिया तौकी ने किया।
Published on:
12 Oct 2017 03:53 pm
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