
शहर को सुंदर व साफ-सुथरा बनाने के लिए आयुक्तो और महापौर ने लगाया दिमाग, हो गया करोड़ो का 'सफाया'
कोटा. नगर निगम प्रशासन की ओर से शहर को सुंदर व साफ-सुथरा बनाने के लिए नवाचार के नाम पर चार साल में करोड़ों रुपए का बजट खपा दिया गया, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। निगम ने जमीनी हकीकत जांचे बगैर ही मोटा बजट खर्च कर दिया। इससे ज्यादा खर्च सफाई के नाम पर किया गया है। हाल ही निगम ने प्रत्येक वार्ड में वार्ड कार्यालय खोलने के नाम पर लाखों रुपए का बजट खर्च कर दिया, लेकिन इनका कोई उपयोग नहीं हो रहा।
निगम ने सफाईकर्मियों की उपस्थिति के लिए सेक्टर कार्यालय आने-जाने में समय व्यर्थ खराब नहीं हो, इसके लिए हर वार्ड में बायोमैट्रिक उपस्थिति की नई व्यवस्था की थी। इसके तहत निगम ने शहर के सभी ६५ वार्डों में एक लोहे की गुमटी लगाई। इसमें बायोमैट्रिक मशीन लगाकर जमादार को सफाईकर्मियों की उपस्थित लेनी थी, लेकिन पिछले तीन माह से वार्डों में लगी इन गुमटियों के ताले लगे पड़े हैं। जिनमें ताले नहीं हैं, उसमें सफाईकर्मी झाड़ू व अन्य सामान रखते हैं। वार्ड कार्यालय के नाम पर करीब २० लाख का बजट खपा दिया है, जबकि कोई उपयोग नहीं हो रहा।
हर आयुक्त का नया आइडिया, बना दिए डस्टबिन-
पिछले चार साल में आयुक्तों व महापौर ने निगम को प्रयोग स्थली बना दिया। स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर आयुक्त ने कचरे की समस्या के समाधान के लिए अलग-अलग डस्टबिन खरीदने और बनाने पर मोटा बजट खर्च कर दिया है। कचरा प्वॉइंटों पर कचरा नहीं फैले, इसलिए पक्के कचरा पात्र तैयार करवाए गए, लेकिन इसमें जेसीबी मशीन से कचरा उठाने में परेशानी आने की बात कहकर स्वच्छ भारत मिशन में लोहे के डस्टबिन तैयार करवाए गए। लोहे के तीन तरह के डस्टबिन रखाए गए। फिर भूमिगत डस्टबिन बनाने की कार्ययोजना तैयार की गई। अब शहर को कचरा मुक्त करने की घोषणा की है।
एसएलआरएम प्रोजेक्ट हो गया फेल-
तीन साल पहले निगम ने एसएलआरएम प्रोजेक्ट के तहत लाखों रुपए का बजट खर्च कर संसाधन खरीदे और ट्रेनिंग के नाम पर लाखों रुपए का बजट खर्च कर दिया। इसमें शहर में निकलने वाले गीले-सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र कर उपयोग किया जाना था। साथ ही, उद्यानों से निकलने वाली पत्तियों से खाद तैयार की जानी थी, लेकिन यह प्रोजेक्ट कुछ दिनों बाद ही दम तोड़ गया है। इसमें करीब ढाई करोड़ रुपए खर्च किए गए थे।
सूखे, गीले कचरे के परिवहन पर खर्चे 32 लाख-
निगम ने करीब डेढ़ वर्ष पूर्व स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहर में कचरा परिवहन के लिए करीब लाखों रुपए खर्च कर हाथ ठेले व रिक्शों की खरीद की। निगम को हर सेक्टर पर कचरा परिवहन में सहयोग के लिए जरूरत के हिसाब से इन्हें भिजवाना था, लेकिन ठेले या रिक्शा कचरा परिवहन के काम नहीं आ रहे। कुछ सेक्टरों में इनका वितरण किया गया। अधिकांश ठेले निगम के रामपुरा स्थित गाड़ी खाने व रिक्शे निगम के स्टोर में पड़े हैं। इन ठेलों व रिक्शों पर इतनी मोटी राशि खर्च करने के बाद भी निगम इनका उपयोग नहीं कर पाया।
पवन अग्रवाल, पार्षद- तीन महीने पहले हर वार्ड में लोहे की गुमटी लगाई थी। इस गुमटी में जमादार को सफाईकर्मियों की बायोमैट्रिक उपस्थित लेनी थी। मेरे वार्ड में गुमटी तो लगा दी, लेकिन उस पर ताला लगा हुआ है।
रेखा लखेरा, पार्षद -मेरे वार्ड में गुमटी न लगाकर सेक्टर कार्यालय में ही लगा रखी है। यह गुमटी किसी काम नहीं आ रही। बायोमैट्रिक मशीन तो गुमटी के बजाय सेक्टर कार्यालय में लगा रखी है। कोई उपयोग नहीं हो रहा है।
ममता कंवर, पार्षद- आईटीआई के निकट लाला पार्क की दीवार के सहारे गुमटी लगाई है। इस गुमटी में बायोमैट्रिक मशीन तो लगा रखी है, लेकिन विद्युत कनेक्शन नहीं होने से ये किसी काम में नहीं आ रही। यह गुमटी तो सफाई कर्मचारियों के झाड़ू रखने के काम आ रही है।
अनिल सुवालका, प्रतिपक्ष नेताभाजपा - बोर्ड में निगम के धन का दुरुपयोग ही हुआ है। परिणाम कुछ भी सामने नहीं आए। चार साल तक सफाई के नए टेण्डर तक नहीं कर पाए थे। सफाई के नाम पर करोड़ों का बजट खर्च कर रहे हैं। मुख्य मार्गों की लेबर की जांच की तो आधी गायब मिली थी।
महेश विजय, महापौर- शहर की सफाई व्यवस्था सुधारने के लिए सार्थक प्रयास किए गए हैं। कचरा प्वॉइंटों को खत्म करने की दिशा में काम शुरू किया गया है। नए डस्टबिन लगाए गए हैं। शहर में डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण किया जा रहा है। वार्डों में सफाई कर्मचारियों की बायोमैट्रिक उपस्थिति दर्ज करने के लिए वार्ड कार्यालय बनाए गए हैं, इनका उपयोग जल्द शुरू होगा।
Published on:
06 Mar 2019 12:36 pm
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