
kota hostel
राजस्थान पत्रिका में हॉस्टल्स और पीजी की बदहाली का खुलासा होने के बाद अधिवक्ता लोकेश सैनी और शादाब खिलजी ने स्थाई लोक अदालत में याचिका पेश की। इसमें कहा कि 19 मई को राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष, जिला कलक्टर और पुलिस अधीक्षक ने गाइड लाइन जारी की थी।
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इसके साथ ही इसकी पालना के लिए दर्जनभर संयुक्त टीमें बनाकर औचक निरीक्षण कराने और जो खामियां मिलें, उन्हें तत्काल ठीक कराने का भी निर्णय हुआ था, लेकिन कुछ दिन तो जिला प्रशासन और पुलिस ने हॉस्टल संचालकों के खिलाफ सख्ती बरती, लेकिन बाद में मामला ठंडा होते ही हॉस्टल्स और पीजी का निरीक्षण बंद कर दिया गया।
उड़ाने लगे धज्जियां
जिला प्रशासन और पुलिस की लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि कोटा हॉस्टल एसोसिएशन अध्यक्ष समेत तमाम रसूखदार लोगों ने आयोग की ओर से जारी गाइड लाइन की धज्जियां उड़ाना शुरू कर दिया। बच्चों की बायोमेट्रिक अटेंडेंस होना तो दूर बहुमंजिला इमारतों में आग बुझाने तक के इंतजाम नहीं किए गए।
जबकि इन इमारतों के मालिकों ने बेसमेंट में ही खाना पकाने के लिए किचन तक चला रखे हैं। किसी दिन बड़ा हादसा हो तो बच्चों को बचाना तक मुश्किल हो जाएगा। कई हॉस्टल तो इतनी संकरी जगहों पर बना दिए गए कि हादसा होने पर फायर ब्रिगेड तक नहीं पहुंच सकती। वहीं 30 हजार से ज्यादा हॉस्टल बिना लाइसेंस के चल रहे हैं।
पंजीयन व लाइसेंस का हो प्रावधान
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मांग की है कि हॉस्टल और पीजी का संचालन पूरी तरह से व्यावसायिक गतिविधि है। इसलिए इनके संचालन से पहले पंजीकरण और लाइसेंस देने का प्रावधान लागू किया जाए। इसके साथ ही प्रशासन और पुलिस को पाबंद किया जाए कि वह गाइड लाइन की पूरी पालना करवाएं। एडवोकेट सैनी ने बताया कि अदालत ने जिला कलक्टर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी कर 20 फरवरी को जवाब पेश करने को कहा है।
Published on:
12 Jan 2018 06:19 pm
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