
Durgadan Singh Gaur: (फोटो-पत्रिका)
कोटा। राजस्थानी भाषा के गीत ऋषि और हाड़ौती के कालिदास के नाम से लोकप्रिय गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ नहीं रहे। उन्होंने इलाज के दौरान झालावाड़ रोड स्थित एक अस्पताल में रविवार शाम करीब साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली। कैथूनीपोल रेतवाली क्षेत्र निवासी गौड़ के बेटे निशामुनि गौड़ ने बताया कि पिता की आयु 80 वर्ष से अधिक थी। वह अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। परिवार में चार बेटे और दो बेटियां हैं।
साहित्य के क्षेत्र में गौड़ ने अमूल्य योगदान दिया। उनकी ‘पाणी में चांद घुले’ समेत दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दो पुस्तकें ‘राधे-राधे’ और ‘रेखाचित्र’ जल्द प्रकाशित होने वाली थीं। गौड़ के निधन को साहित्यकारों ने अपूरणीय क्षति बताया। वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि अतुल कनक ने कहा कि गौड़ का स्थान कोई नहीं ले सकता। उनके गीत हृदय को छूते थे। अन्य साहित्यकारों ने भी गौड़ के निधन को साहित्य के क्षेत्र में बड़ी क्षति बताया।
साहित्य के एक आयोजन में हल्की-सी मुस्कान लिए दुर्गादान सिंह गौड़ ने एक बार कहा था, ‘भाई साहब, आपण तो आपण ई छां, आपण कोई से कम कोई न।’ यह उनका स्वभाव था और वह ऊंचाई भी, जहां वे खड़े हुए थे। इस अंचल के अतिरिक्त जब भी उन्हें देश के विद्वानों ने सुना, वे सुनते ही रह गए।
झालावाड़ में डॉ. नंदकिशोर पांडेय, जो वर्तमान में हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु हैं, उन्होंने जब गौड़ को जयपुर में सुना तो कहा, ‘दुर्गादान सिंह गौड़ राजस्थान के विद्यापति हैं।’ शृंगार को लेकर देश के जाने-माने गीतकार बालकवि बैरागी ने कहा था, ‘दुर्गा के बाद?’ आज वह वक्तव्य खरा उतर रहा है। वे शृंगार को शिखर पर लेकर गए। मेरा मानना है कि वे शृंगार के शिखर के स्वर्ण कलश थे। मैंने उनको उस समृद्ध शृंखला में पाया, जो बच्चन की परिवर्तित शृंखला कही जाती है।
साठ के दशक में अकाल पर उनका गीत ‘हिवड़ो जले, म्हारो जियरो बले, धरती थारा जाया लाल भूखा क्यों मरै’ गीत काफी प्रसिद्ध हुआ। उनके जैसा लोक में घुला-मिला कवि शायद ही कोई हो। वे जब साठ-सत्तर के दशक में ‘मद्गाल्यो मोरयो’ गाते तो जवान पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी भी चुप होकर सुनती रह जाती।
‘तू कतनी खूब चले छै, जाणै थाली में मूंग रळै छै।’ अब ‘न्हाती धोती नतरती दैखी’ जैसे गीतों की मिठास कर्णपटल पर हमेशा गूंजती रहेगी। उनका संयोग शृंगार भी उच्च कोटि का और वियोग शृंगार भी। आम आदमी की संवेदनाओं को भी उन्होंने गहराई के साथ समझा और लिखा। उनका जाना हाड़ौती अंचल ही नहीं, बल्कि राजस्थान के शृंगार गीतों के एक युग का जाना है। उन्हें साहित्य जगत हमेशा याद करता रहेगा।
-जितेन्द्र निर्मोही
Updated on:
16 Aug 2026 10:48 pm
Published on:
16 Aug 2026 10:48 pm
