
कोरोना से बेखबर 'सहराणों' में रोजगार है बड़ी चिन्ता
मुंडियर/ देवरी. एक और सरकार और प्रशासन कोरोना वायरस महामारी से लोगों को जागरूकता करने का दावा कर रहा है वहीं क्षेत्रके आदिवासी अंचल में प्रशासन के दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। जिले के अंतिम छोर पर मध्यप्रदेश की सीमाओं से सटे आदिवासी अंचल क्षेत्रों में राजस्थान पत्रिका टीम ने पहुंचकर जमीनी हकीकत के बारे में जानकारी ली तो वहां के लोग कोरोना वायरस संक्रमण से बेखबर और उदासीन नजर आए। यहां कई स्थानों पर दर्जनों लोग जगह-जगह समूह में बैठे दिखे।
बीलखेड़ा डांग ग्रामपंचायत के नयागांव, सहराना बस्ती, बील खेड़ा डांग, सनवाड़ा ग्राम पंचायत के सनगवां, सांधरी, सहराना बस्ती, सहरिया बंगला में समूह में बैठे लोग सरकारी नियमों पर सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ते दिखे। इन लोगों से जब संक्रमण फैलने के बारे में पूछा तो सनगवां निवासी कोटी सहरिया, बील डांग के सहराना बस्ती में फूसया सहरिया ने बताया कि उन्हें कोरोना महामारी के बारे में जानकारी नहीं है।
सप्ताह में एक दिन चिकित्सा विभाग की ओर से एएनएम उप स्वास्थ्य केंद्र पर आती है। उसने भी हमें कभी कोरोना महामारी के बारे में कोई बात नहीं बताई। यह वे गांव है जो जिले को पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश की सीमा से सटे हैं।
लकडिय़ों पर बना रहे भोजन
नयागांव निवासी महिला श्याम बाई ने बताया कि लॉकडाउन के बाद न मजदूरी के लिए जा सकते न ही इस क्षेत्र में कहीं मजदूरी के लिए कोई जगह है। पैसे नहीं होने से गैस सिलेंडर भी नहीं भरवा सकते। इसलिए जंगलों से लकडिय़ां लाकर खाना बनाना पड़ रहा है। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में फसल कटाई का पूरा हो गया, ऐसे में रोजगार के लिए दूर जाना चाहते हैं, लेकिन आने-जाने के लिए ट्रैक्टर-ट्रॉली व अन्य साधन नहीं मिल रहे। इस साल मध्यप्रदेश के लोग भी मजदूरों को लेने नहीं आए।
रोजगार के लिए वन उपज की तलाश
बील खेड़ा माळ के रास्ते में सड़क किनारे जंगलों में समूह बनाकर लोग वन उपज की तलाश में भटकते नजर आए। नया गांव निवासी श्याम बाई सहरिया, माधव सहरिया ने बताया कि बाजार और रोजगार बंद होने से सहरिया लोग अब जंगलों में महुआ, गोंद, तेंदू पत्ता सहित अन्य वन उपज तलाशने जंगलों में आ रहे हैं। जिससे की कुछ कमाई हो सके। लोगों को सरकार द्वारा गेहूं का वितरण तो कर दिया है, लेकिन अन्य खाद्य सामग्री के लिए पैसे की जरूरत है। जिसके चलते जंगलों में वन उपज लाकर लोग अपना काम चला रहे हैं। लोग अपने परिवार के साथ सुबह होते ही जंगलों का रुख कर लेते हैं और दोपहर होते-होते वन उपज लाकर गांव की किराने की दुकानों पर बेचते हैं।
Published on:
11 Apr 2020 07:04 am
