
खंड-खंड होकर बिखर रहा गौरवशाली और समृद्ध इतिहास
हेमंत भार्गव. केलवाड़ा. जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 27 के नजदीक पूर्व दिशा में स्थित है प्राचीन नगर केलवाड़ा। यहां स्थित प्राचीन दुर्ग जर्जर होकर अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। अब तक इसके संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने कोई खास कदम नहीं उठाए हैं। जबकि शाहाबाद किले का पुनर्निर्माण कार्य पुरातत्व विभाग ने शुरू करवा दिया है। जानकारों के अनुसार इसका निर्माण संभवत: शाहाबाद की स्थापना के समकक्ष माना जाता है। यहां किले के पीछे दक्षिण दिशा में दो नादिया की प्रतिमा और असंख्या प्रतिमाओं के भग्नावशेष हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार ये छठी से आठवीं शताब्दी के मध्य के माने जाते हंै। यहां एक बहुत बडा शिवालय है। इसके अंदर शिवलिंग स्थापित है। पहले यह मंदिर बहुत कलात्मक और भव्य रहा होगा, क्योंकि बिखरे अवशेषों के स्तूप, खंभे, मंडप, तोरणद्वार की स्थापत्य कला देखने से इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। यहां दो नंदी की प्रतिमा के गले में डली घंटी आज भी असली मालूम पड़ती है।
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नागा साधुओं के भी हैं अवशेष
किले में बिखरे पड़े अवशेषों में एक प्रतिमा कौपिन (लगोंट) धारण किए किसी नागा साधू की लगती है। जानकारों के अनुसार यह प्राचीन देवालय के भग्न अवशेष केलवाड़ा का नाम सार्थक करते हैं। केलवाड़ा जो केवल्य से संबधित होगा। इसी का आगे विकृत स्वरूप केवल्य से केलवाड़ा हो गया। यहां भग्न अवशेषों मे प्राप्त मूर्तियां जिसमं नागा साधू व अन्य हैं, इस तरफ इशारा करती है। इस स्थान से थोड़ा सा आगे एक बगीचा है। इसके अंदर काली माता की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। कंकाली और पास में शिव का स्थान किसी काल मे शायद तंत्र साधना के लिए बनाया गया होगा। विशेषज्ञ के अनुसार ऐसा बहुत कम होता है जब काली माता और शिव के स्थान पास-पास हों।
राजपूत शैली की स्थापत्य कला
केलवाड़ा दुर्ग सामान्य आकार का राजपुताना शैली पर आधारित खाई दुर्ग है। किले के चारों और एक गहरी खाई है। इसे दुर्ग की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से बनवाया गया था। यह खाई पक्की दीवारों से निर्मित है। किले का फर्श भी पक्का है। विशेषज्ञ के अनुसार संकट के समय इसमें पानी भरकर बड़़े-बड़े मगरमच्छ छोड़े जाते थे।, ताकि दुश्मन किसी भी तरीके से खाई को पार न कर सके। किले का प्रवेशद्वार उत्तराभिमुखी है। किला ऊंची प्राचीरों से घिरा है। इसमें जगह-जगह निगरानी चौकी के तौर पर बुर्ज बने हैं। यहां तोप रखने और दुश्मन पर निशाना लगाने के लिए जगह भी बनी हुई है। प्राचीर पर तोप रखने के उन्नत स्टैंड बने हुए हैं। किले के अंदर बहुत सी इमारतें थी। इनमें कुछ महल की तरह बनी हुई हैं। फिलहाल इनमें से कुछ ही शेष रह गई हैं।
मंदिर और मजार जर्जर
किले में एक मजार और मंदिर भी है। लकेलवाड़ा के इतिहास के बारे में इतिहासविद् हंसराज नागर का कहना है कि केलवाड़ा शुरू से शाहाबाद राज्य का हिस्सा रहा है। केलवाड़ा का किला भी संभवत वहां के शासकों ने ही बनवाया। सन 1779 में कोटा राज्य के महाराव उम्मेद सिंह प्रथम (1770-1819) के समय कोटा के दीवान झाला जालिमसिंह के नेतृत्व में दिग्विजय अभियान चलाया गया था। उस समय शाहाबाद में मराठा ब्राह्मण खांडेराव के पुत्र मेघसिंह का शासन था। तब कोटा रियासत ने इसे जीत लिया और तब से यहां कोटा का शासन हो गया। झाला जालिमसिंह ने बड़ौरा के जमींदार अनवर खां पठान को केलवाड़ा जागीर मे दे दिया। तब से अनवर खां केलवाड़ा किले मे रहकर शाहाबाद की निगरानी करने लगा। झाला जालिम सिंह द्वारा दुर्ग की मरम्मत कराये जाने का उल्लेख भी मिलता है। सन 1838 मे झालावाड़ कोटा से अलग राज्य बना तब केलवाड़ा झालावाड़ राज्य में आ गया। उसके बाद एक समझौते के तहत इसे 1899 में कोटा मे मिला दिया गया। वर्तमान मे यह बारां जिले के शाहाबाद खंड की उपतहसील है। केलवाड़ा जिले के बड़े कस्बों में से एक है। इसमे दो ग्राम पंचायतें हंै। एक केलवाड़ा और दूसरी दांता। केलवाड़ा और प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सीताबाड़ी एक हो गये हंै।
Published on:
28 Aug 2020 12:11 am
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