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हाड़ौती में 25 हजार साल पहले शुरू हुई आदि शक्ति की अराधना

हाड़ौती के शैलाश्रयों में बिखरे पड़े हैं त्रिशूल, स्वास्तिक और चक्र के शैलचित्र। तिपटिया के शैलाश्रय में मिला है अब तक का सबसे स्पष्ट दैवीय आकृति की रॉक पेंटिंग।

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कोटा.

हाड़ौती में आदि शक्ति की आराधना का चलन 25 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। कोटा से लेकर बूंदी, बारां और झालावाड़ में सैकड़ों किलोमीटर के इलाके में फैले घने जंगलों के बीच आदि मानव के ठिकाने रहे शैलाश्रयों में चारों ओर बड़ी मात्रा इसके स्पष्ट सबूत बिखरे पड़े हैं। अधिकांश जगहों पर दैवीय प्रतीकों चक्र, त्रिशूल, सूर्य और स्वास्तिक का चित्रांकन किया गया है, लेकिन दरा के शैलाश्रयों में तो दैवीय आकृति का चित्रण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

आदि मानव ने जमाया था डेरा

करीब 75 हजार साल पहले आदि मानव ने चम्बल घाटी में डेरा जमाना शुरू किया। पहाड़ों की ऊपरी गुफाओं (शैलाश्रयों) में गृहस्थी जमाई और आसपास जो दिखाई पड़ा उसे चित्रों की शक्ल में दीवारों पर उकेर दिया। इन शैलचित्रों में उस दौर की जीवन शैली और पूजा पद्धतियों की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है। शैलचित्रों में पूजा प्रतीकों पर अंतरराष्ट्रीय शोधपत्र लिखने वाले कोटा विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ हैरिटेज के कॉर्डिनेटर डॉ. मोहन लाल साहू बताते हैं कि सबसे पहले (करीब 20 से 25 हजार साल) आदि मानव ने दैवीय प्रतीकों का रेखीय चित्रण शुरू किया। जिसकी शुरुआत उसने त्रिशूल के चित्र से की।

शिकार नहीं पूजा के लिए इस्तेमाल होता था त्रिशूल

आमतौर पर धारणा है कि त्रिशूल का इस्तेमाल आदि मानव ने हथियार के रूप में किया होगा, लेकिन डॉ. साहू इसे सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि अलनिया के शैलचित्रों में त्रिशूल की जो आकृतियां हैं उनकी बीच की भुजा तो सीधी है, लेकिन किनारे की दोनों भुजाएं मुड़ी हुई हैं। साथ ही तीनों भुजाएं आगे से पैनी होने के बजाय भौंथरी और चौंड़ी हैं। जिससे साबित होता है कि इसका इस्तेमाल शिकार की बजाय धार्मिक प्रतीकों के रूप में किया गया था। यहीं एक छोटे शैलाश्रय में देवियों के चित्र मिलने से साबित होता है कि उस दौर में शक्ति की आराधना शुरू हो चुकी थी।

स्वास्तिक के रूप में सूर्य पूजा

हाड़ौती के शैलाश्रयों में जहां भी त्रिशूल के चित्र मिले हैं उनके साथ स्वास्तिक का चित्रण जरूर मिलता है। यानि आदि काल से ही आदि शक्ति के साथ सूर्य की पूजा का चलन था। स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना जाता है, जबकि त्रिशूल को देवी का। डॉ. साहू बताते हैं कि अलनिया के शैलाश्रयों में तो सबाहू (एक रेखीय) स्वास्तिक के साथ-साथ अबाहू (बहुरेखीय) स्वास्तिक चिन्ह भी बने हुए हैं। जबकि चामलिया नाला में सफेद रंग से सूर्य का स्पष्ट चित्र बनाया गया है। वहीं गोलपुर (बूंदी) के शैलाश्रय में वेदी का एक दम साफ चित्र बनाया गया है। जिससे स्पष्ट होता है कि आदि मानव ने करीब 10 हजार साल पहले वेदी सजा कर त्रिशूल, स्वास्तिक एवं सूर्य के साथ दैवीय आराधना का चलन शुरू कर दिया था। जबकि बारां जिले के भड़किया में तो इन पूजा प्रतीकों के साथ-साथ चक्र के चित्र भी मिलते हैं। जो देवी के स्वरूप को पूरा कर देते हैं।

आदि शक्ति नमोनम:

डॉ. साहू कहते हैं कि दरा स्थित तिपटिया के शैलचित्रों में आकर तो सारी आशंकाएं ही खत्म हो जाती हैं। यहां दो मुंह के घोड़े पर सवार देवी का चित्रण मिलता है। इस चित्र में देवी के हाथों में गदा, त्रिशूल और चक्र है। वहीं मस्तक पर सूर्य धारण किए हुए हैं। जबकि दोनों कानों के पास स्वास्तिक का चित्रण किया गया है। सिर पर मुकुट भी सजा है। जिराफ और मेंमथ भी है यहां डॉ. साहू बताते हैं कि अलनिया के शैलाश्रयों में जिराफ के साथ-साथ मेंमथ के शैलचित्र भी मिलते हैं। जिससे पता चलता है कि यह दोनों जीव उस दौर में इस इलाके मेें पाए जाते थे। हाड़ौती में सबसे पुराने उत्खनित शैलचित्र (पेट्रोग्लिब्स) रावतभाटा के पास श्रीपुरा में मिले हैं। करीब 30 हजार साल पुराने इन शैलचित्रों में मानव आकृतियों को पत्थरों पर गोदा गया है। हाड़ौती के शैलचित्रों की दूसरी बड़ी खासियत उनके रंग हैं। इस इलाके में आदि मानव ने शैलचित्र बनाने में लाल रंग के साथ-साथ सफेद रंग का भी बखूबी इस्तेमाल किया था।