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अव्यवस्थाओं की मंडी में किसानों को नसीब हो रही जली रोटियां , पानी सरीखी दाल..

किसानों को परोसी जा रही कई रोटियां जली हुई होती हैं तो कई आधी कच्ची भोजन की गुणवत्ता इतनी खराब है कि यह किसानों के गले तक नहीं उतरता।

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Kisan Kaleva scheme

कोटा .

भामाशाह मंडी में उपज बेचने के लिए आने वाले किसानों को 'सरकारी कलेवे' में जली रोटियां और पानी सी दाल नसीब हो रही है। भोजन की गुणवत्ता इतनी खराब है कि यह किसानों के गले तक नहीं उतरता। मंडी में किसान कलेवा योजना के तहत किसानों को परोसी जा रही कई रोटियां जली हुई होती हैं तो कई आधी कच्ची। इन्हें किसान पूरी भी नहीं खा पाता। गुड़, छाछ तो किसानों को ठेकेदार द्वारा परोसे ही नहीं जा रहे।

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प्रावधान तो यहां 200 ग्राम आटे की चपाती परोसने का है, लेकिन हकीकत में पतली 6 चपाती से ज्यादा नहीं परोसी जाती। दाल की हालत देख लें तो ऐसी है कि उसमें ढूंढने से भी दाल नहीं मिलती। मंडी में किसान कलेवा योजना के तहत 200 से अधिक किसानों को रोजाना टोकन जारी किए जाते हैं। मंडी में काम करने वाले हम्मालों को भी भोजन के टोकन जारी किए जाते हैं।

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यह है प्रावधान
किसान कलेवा योजना के तहत मंडी में उपज बेचने वाले किसानों को 200 ग्राम आटे की चपाती, दो सब्जियां, सर्दी में गुड़ व गर्मी में छाछ भोजन में उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इसके लिए मंडी प्रशासन ने 24.80 रुपए प्रति किसान के हिसाब से टेंडर कर रखा है। इसे मंडी प्रशासन द्वारा 19 रुपए 80 पैसे प्रति कूपन का भुगतान किया जाता है। ठेकेदार
प्रत्येक कूपन 5 रुपए टोकन मनी लेता है।

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पानी में कचरा
सोमवार को जब ये संवाददाता मंडी पहुंचा तो यहां किसानों को भोजन के साथ परोसे जाने वाले पानी की बाल्टी में कचरा पड़ा हुआ था। पानी भी ठंडा नहीं था। ऐसे पानी को देख कई किसान तो भोजन करने के बाद प्यासे ही लौट जाते हैं।

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कोटा भामाशाह मंडी के सचिव डॉ. आरपी कुमावत का कहना है किभोजन की गुणवत्ता का निरीक्षण किया जाता है। दिनभर में करीब 200 से अधिक किसानों को भोजन के टोकन बांट दिए जाते हैं। उपज की आवक ज्यादा होने पर टोकन की संख्या बढ़ जाती है। अगर ठेकेदार द्वारा भोजन की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा तो पाबंद किया जाएगा।