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व्यंग्य : ताजमहल बनाम जातमहल

ताजमहल पर गर्माती सियासत पर कोटा के बालकवि डा आदित्य जैन का विशेष व्यंग्य

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कोटा

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Deepak Sharma

Oct 30, 2017

tajmahal

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माहौल अपनेपन और लगाव का है। जी हां.. ये मौसम चुनाव का है। ऐसे में अगर आप "प्रेम की निशानी" के बहाने.., अपना निशाना लगाने 'आगरा' जा रहे हैं... तो मत जाइए, पछताएंगे... ताजमहल देखने के चक्कर में "जातमहल" पहुंच जाएंगे। आजकल "जातमहल" के उद्यान की घास कई चुनाव गधे चर रहे हैं। खुद के वजूद का तो पता नहीं पर 'ताज' की 'जात' डिसाइड कर रहे हैं।

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एक समूह तलवार लेकर धमका रहा है.. कि जात महल का असली रंग 'हरा' है। ये तो मुग़ल बादशाह की बेगम का मकबरा है। दूसरी और "तेजोमहालय" के नारे चल रहे हैं। भोले के नाम पर 'भाले' निकल रहे हैं। सियासत ने इस कदर हैरान कर दिया है। पत्थरों को भी हिंदू मुसलमान कर दिया है। छोटी सी बात पर बवाल होने लगा है। सफेद ताज की चौखट का रंग लाल होने लगा है।

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समझ नही आता कि आखिर कब तक सियासत की बलिवेदी पर हम विरासत को कुर्बान करते जाएंगे। कब तक हर बात में हिंदू मुसलमान करते जाएंगे। अगर सड़कों पर आने का शौक है ....तो आतंकवाद भ्रष्टाचार या महंगाई के विरोध में कुछ सड़कों पर क्यों नहीं आता ? जनता की कटती हुई जेबों पर कोई दुख क्यों नहीं मनाता ? क्या भूख से मरने वालों की मौत पर आंसू बहाने का कायदा नहीं है..? सच तो यह है कि उनसे इन्हें कोई "पॉलिटिकल फायदा" नहीं है।

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यह लोग सचमुच "चिकने घड़े" हो गए हैं। देश छोटा हो गया है 'स्वार्थ' बड़े हो गए हैं। लेकिन कम से कम मोहब्बत की निशानी को तो राजनीतिक हवस भरी नजरों से मत देखो। माना कि ठंड का मौसम आ रहा है पर जातिवाद की आग लगा कर उस पर "राजनीतिक स्वार्थ" की रोटियां मत सेंको। क्योंकि इन रोटीयों को खाकर ही विकास सो गया है। जातियों के नारों में देश हो गया है।

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अरे सच तो यह है कि इस देश का तिरंगा 'केसरिया' और 'हरा' दोनों ही रंगों से सना है। यह देश 'मुझसे' या 'तुमसे' नहीं बल्कि हमसे मिलकर बना है। इस 'हम' में 'ह' हिंदू और 'म' मुसलमान का हैं। खून मत बहाओ.. यह खून हिंदुस्तान का है। "तेजो" या "ताज" के झगड़े को छोड़ो.., वह तो साकार कल्पना है कला प्रेमी मन की.., अब भी समय है.. इस को बचा लो,.. सच्ची धरोहर है ये अपने "वतन" की

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