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World Heritage Day: 100 साल पहले भी कोटावासियों से वसूला जाता था टोल टैक्स, पढि़ए, पालटून पुल का इतिहास

कोटा में 100 साल पहले पालटून पुल से गुजरने पर कोटावासि‍यों से हर महीने औसतन 1250 रुपए और सालाना 15,000 रुपए की टोल वसूली।
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कोटा

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Zuber Khan

Apr 18, 2019

World Heritage Day

World Heritage Day: 100 साल पहले भी कोटावासियों से वसूला जाता था टोल टैक्स, पढि़ए, पालटून पुल का इतिहास

कोटा. हर सफर मंजिल हासिल करने के लिए ही शुरू होता है, लेकिन जब कदम उठते हैं तब राह की दुश्वारियां पता चलती हैं... एक सदी पहले कोटा के अवाम की दुश्वारियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पक्की तो छोडि़ए शहर को देश दुनिया से जोडऩे के लिए कच्ची सड़कें तक नहीं थीं... पगडंडियों के जरिए ही मंजिल तय होती। फिर एक दशक ऐसा भी आया, जिसमें बने दो पुलों ने सदियों का सफर आसान कर दिया।

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चम्बल... कोटा रियासत की सबसे बड़ी थाती ही नहीं, मुसीबत भी थी। बारहमासी लबालब बहने वाली नदी ने रास्ते लंबे और सफर मुश्किल बना दिए थे। तत्कालीन महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय इस बात को अच्छे से भांप चुके थे कि जब तक चंबल पर पुल नहीं तनेगा तब तक रियासत का विकास भी आगे नहीं बढ़ सकेगा।


पालटून से पक्के पुल तक
महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने रियासत में निर्माण कार्यों में तेजी लाने के लिए स्टेट इंजीनियर की नियुक्ति कर दी थी। स्टेट इंजीनियर रहे अंग्रेज अफसर आरएच टिकेल को चम्बल पर पालटून पुल बनाने की जिम्मेदारी दी गई। संवत 1954 की कोटा रियासत की एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट के मुताबिक, 10 नवंबर 1898 के दिन इस पुल को आवागमन के लिए खोल
दिया गया। पुल के निर्माण और सड़कों पर 87,024 रुपए खर्च किए गए। आवागमन बढ़ता देख महाराव ने नावों के इस पुल की जगह पक्का पुल बनाने का निर्णय लिया और जिसे हम आज रियासतकालीन पुलिया के नाम से जानते हैं। उस पक्के पुल का 1919-20 ईस्वी में 2,48,000 रुपए की लागत से निर्माण हो सका।

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वसूला जाता था टोल
इतिहासकार प्रो. जगत नारायण श्रीवास्तव बताते हैं कि इस पुल से गुजरने के लिए टोल भी लिया जाता था। वर्ष 1898 की एडमिनिस्टेशन रिपोर्ट के मुताबिक, पालटून पुल से हर महीने औसतन 1250 रुपए और सालाना 15,000 रुपए की टोल वसूली का उल्लेख मिलता है। हालांकि पुल बनने के बाद जयपुर, उदयपुर, अजमेर, दिल्ली और आगरा तक कोटा के खास-ओ-आम की पहुंच आसान हो गई थी।