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सालों पहले नवरात्र पर प्रचलित थी यह प्रथा, भूत की आकृति दीवार पर बनाकर कन्याएं लगाती थीं सुरक्षा की गुहार

नवरात्र का समापन एक ऐसी कथा के साथ होता था, जिसमें बालिकाएं भूत की आकृति दीवार पर बनाकर उससे सुरक्षा की गुहार लगाती थीं

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lalitpur

सालों पहले नवरात्र पर प्रचलित थी यह प्रथा, भूत की आकृति दीवार पर बनाकर कन्याएं लगाती थीं सुरक्षा की गुहार

ललितपुर. नवरात्र एक प्रमुख पर्व है। हर जगह यह त्योहार पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। लेकिन बुंदेलखण्ड में सालों पहले नवरात्र का समापन एक ऐसी कथा के साथ होता था, जिसमें बालिकाएं भूत की आकृति दीवार पर बनाकर उससे सुरक्षा की गुहार लगाती थीं। बुन्देलखण्ड भारत के बीच में पड़ता है। इस वजह से यह क्षेत्र पुरानी संस्कृत विरासतों का धरोहर बना हुआ है। इस क्षेत्र में अब भी कई प्रथायें प्रचलित हैं, जिसमें लोगों का मानना है कि ये उन्हें बीमारी मुक्त कर सकती हैं।

यह है कथा को लेकर लोगों की मान्यता

नवरात्र में नौ दिन का व्रत किया जाता है। सालों पहले से बालिकायें इस व्रत को सुबह से ही करना शुरू कर देती। गलियों, मोहल्लों में बालिकायें तोतले मुंह से 'श्बाबुल जू की कुंअर लड़ायेतू नारे सूवटा्य' गीत गाना शुरू कर देती थीं। मोहल्ले की बालिकायें एक स्थान पर भूत की आकृति दीवार पर बनाती थीं। सुबह से ही वह भूत से सुरक्षा की गुहार लगाती थीं। इस पर्व के सम्बन्ध में किवदंती है कि एक निशाचर बालिकाओं को मारकर उनका भक्षण कर लेता था। जब बालिकायें एकजुट हुईं और उन्होंने प्रार्थना की तब उस राक्षस ने कहा कि यदि वह नवरात्र के दौरान उसकी आराधना करेंगी, तो वह निर्भय रहेंगी। तभी से बुन्देलखण्ड में यह प्रथा प्रचलन में बनी हुई हैं। राक्षस को सम्भवतरू भूत कहा जाता है, जिसकी प्रतीकात्मक आकृति दीवारों पर बनायी जाती है। नौ दिन के पश्चात बालिकायें नौरता स्थल पर कन्या भोज का आयोजन करती हैं।

इस गीत के साथ नवरात्र पर्व का समापन

नवरात्र अश्विन मास की प्रतिपदा को शुरू होता है। नवमी के दिन इस पर्व का समापन होता है। इस दिन बालिकायें अपने सिर पर छिद्र युक्त घट धारण कर उसके भीतर जलता हुआ दीपक रखती हैं। साथ ही यह गीत गाती थीं, 'श्नारे सूवटा, कौन बड़ेजू की पौर, पौर के पुरैया सब सो गये्य'। इसके साथ ही बालिकायें नृत्य करती हुईं कन्याभोज की व्यवस्थाओं के लिए सांकल खटखटा कर आर्थिक दान भी मांगती थीं।

वक्त के साथ यह परम्परा भी विलुप्त हो गयी है। अब कहीं भी सूवटा नौरता पर्व के दौरान गाये जाने वाले गीत सुबह सुनाई नहीं पड़ते। बुन्देलखण्ड में लगभग खत्म हो चुकी इस प्रथा को निभाने वाली बालिकायें न केवल स्वस्थ रहती थीं बल्कि बौद्धिक विकास भी होता था। इसका प्रमुख कारण यह हो सकता है कि सुबह में जागरण के अलावा पर्व के दौरान किये जाने वाले कार्य उनमें अनोखी शक्ति का संचार करते थे। केवल नौरता ही नहीं पर दिवारी, लमटेरा के अलावा अन्य बुन्देलखण्डी गीत भी नदारद हो चुके हैं। अगर अस्तित्व में हैं भी, तो वह कुछ ही मौकों पर ही सुनायी देते हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत तेजी से खत्म हो रही है। इस बात पर चिंता जताई है और अपील की है कि वह परम्पराओं को प्रोत्साहित करने का कार्य करें।