3 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘ब्रांड अखिलेश’ के नाम पर नहीं होगा समझौता, मुलायम की साइकिल हो जाएगी ‘जब्त’!

गृहयुद्ध के बाद यादव परिवार में एक बार फिर टिकटों के विवाद पर दंगल शुरू हो चुका है

3 min read
Google source verification

image

Kaushlendra Singh

Dec 30, 2016

Akhilesh

Akhilesh

लखनऊ।
'गृहयुद्ध' के बाद यादव परिवार में एक बार फिर टिकटों के विवाद पर 'दंगल' शुरू हो चुका है। अपने पसंदीदा लोगों को टिकट दिलाने के चक्कर में रिश्ते दांव पर लग चुके हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बगावती तेवर अख्तियार करते हुए पहले अपनी लिस्ट जारी की अब सुनने में आ रहा है कि वे पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल को भी जब्त कराने की कोशिश कर सकते हैं।


गुरुवार को हुई मुलायम, शिवपाल और अखिलेश के बीच की बैठक के बेनतीजा रहने के बाद लोगों को लगने लगा था कि परिवार में फिर दंगल शुरू होगा। हुआ भी वैसा ही, अखिलेश ने देर रात अपनी लिस्ट जारी की तो जवाबी कार्रवाई में शिवपाल ने भी बची सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। एक अगंरेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक सीएम अखिलेश अब साइकिल को राजनीति से बाहर करने का मन बना चुके हैं। वे चुनाव आयोग जाकर पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल को जब्त करने की मांग कर सकते हैं।


रामगोपाल का साथ अखिलेश को बनाता है मजबूत


यूपी के सीनियर आईएएस सूर्यप्रताप सिंह के मुताबिक सपा की चार अक्टूबर 1992 को स्थापना के दौरान आयोग में चुनाव चिह्न के लिए पार्टी महासचिव की हैसियत से प्रो. रामगोपाल यादव ने आवेदन किया था। जिस पर पार्टी को मिला चुनाव चिह्न बतौर पदाधिकारी उन्हें आवंटित किया गया था। जाहिर है कि अब जिस ओर रामगोपाल होंगे चुनाव चिन्ह पर उसी खेमे की दावेदारी ज्यादा मजबूत होगी। रामगोपाल स्पष्ट तौर पर अखिलेश के समर्थक हैं और समय-समय पर वे शिवपाल और मुलायम के फैसलों की मुखालफत भी करते आए हैं।


कांग्रेस का भी है मौन समर्थन


सूत्रों की मानें तो अखिलेश के बगावती तेवर को कांग्रेस का भी मौन समर्थन प्राप्त है। कांग्रेस को राज्य में दोबारा जी उठने के लिए जिस संजीवनी की तलाश थी वह उसे इस वर्चस्व की लड़ाई और टूटती सपा में साफ नजर आ रही है। साफ जाहिर है कि अगर अखिलेश अलग होते हैं तो उन्हें कांग्रेस जैसे मजबूत संगठन की जरूरत होगी। जनता ने अगर अखिलेश-कांग्रेस गठबंधन को स्वीकारा तो पार्टी 27 साल बाद एक सम्मानजनक स्थिति में होगी। अखिलेश पूर्व में भी कांग्रेस के साथ गठबंधन की वकालत कर चुके हैं।


अपनी छवि से समझौता नहीं करेंगे अखिलेश


2012 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश ने लगातार अपनी छवि साफ-सथुरी बनाए रखी अब ऐन चुनाव के वक्त वे अपनी छवि धूमिल नहीं होने देना चाहते। अखिलेश ने न सिर्फ अपनी बल्कि पार्टी की छवि को भी साफ-सुथरा करने की हरसंभव कोशिश की। चुनाव के बाद दबंग नेता डी. पी. यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा उन्होंने राज्य की जनता को समाजवादी पार्टी के बदलने का संकेत दिया था। लेकिन अब चुनावी गुणाभाग में मुलायम और शिवपाल को अखिलेश की पाक छवि परेशानी का सबब बन रही है तो वहीं मुख्यमंत्री 'ब्रांड अखिलेश' से समझौता करने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि अखिलेश बगावती होने पर उतारू हैं।


ये है अखिलेश के गुस्से की असली वजह


राजनैतिक जानकारों के मुताबिक अखिलेश अपने कुछ पसंदीदा लोगों को टिकट दिलाना चाहते थे लेकिन जब उनकी नहीं चली तो उन्होंने बगावती रुख अपना लिया। इसके अलावा टिकट बंटवारे के वक्त सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव द्वारा बोली गई एक बात ने अखिलेश का गुस्सा बढ़ा दिया। मुलायम सिंह ने उस वक्त शिवपाल की बात पर अपनी मुहर लगाई थी कि पार्टी चुनाव में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं उतारेगी, मुख्यमंत्री का चुनाव विधायक दल की बैठक में किया जाएगा। यही वजह है कि अखिलेश चाहते हैं कि उनके ज्यादा से ज्यादा समर्थक विधायक दोबारा चुनावी रण में उतरें ताकी उनकी ताजपोशी आसान हो सके।


यह भी पढ़ें: अखिलेश के लिए मुलायम क्यों हुए 'हानिकारक'? जानिए 5 बड़ी वजहें

ये भी पढ़ें

image