
सवर्णों के विरोध ने बीजेपी की बढ़ाईं मुश्किलें, एससी-एसटी एक्ट पर पार्टी में भी विरोध के सुर तेज
हरिओम द्विवेदी
लखनऊ. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में अचानक सवर्णों का गुस्सा फूट पड़ा है। एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ अगड़ी जातियों के विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। भाजपा के कुछ विधायक और सांसद इसके विरोध में हैं। तो कुछ पक्ष में भी हैं। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा और क्षत्रिय महासभा तो खुलकर इस एक्ट का विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर सवर्ण ग्रुप एससी-एसटी एक्ट के विरोध में मुहिम चला रहे हैं। फेसबुक पर मोदी सरकार के विरोध में नोटा का बटन दबाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। इस मुद्दे पर सभी पार्टियां मौन हैं। जाति की राजनीति में सवर्णों की अनदेखी किस पार्टी को कितनी भारी पड़ेगी कहना मुश्किल है। पारंपरिक तौर पर अगड़ी जातियों को भाजपा का वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि इस बार क्या सवर्णों की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ेगी? पेश है रिपोर्ट-
अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन और आरक्षण को लेकर बीजेपी सरकार के खिलाफ सामान्य वर्ग का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। छह सितंबर को सवर्ण संगठनों की ओर से bharat band का आह्वान किया गया है। अलग-अलग राज्यों में बीजेपी के केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, विधायकों व पार्टी पदाधिकारियों को सवर्णों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी में भी एससी-एसटी एक्ट का विरोध शुरू हो गया है। पार्टी के ही नेता केंद्र व प्रदेश सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने की बात कह रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी विधायक और सांसदों ने भी एससी-एसटी एक्ट का विरोध शुरू कर दिया है। बलिया जिले के बैरिया से विधायक सुरेंद्र सिंह ने एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के मुद्दे पर बीजेपी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सभी दल 75 फीसदी जनता को जेल भेजने की साजिश रच रहे हैं। मीडिया में चल रहीं खबरों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि अगर सवर्णों के साथ ज्यादती हुई तो वह चुप नहीं बैठेंगे। वहीं, एससी-एसटी एक्ट और अन्य मुद्दों को लेकर बीते दिनों सहारनपुर जिले की देवबंद सीट से विधायक रहीं शशिबाला पुंढीर ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC-ST Act में किये गये संशोधन को रद्द करने से मैं बेहद नाराज हूं। यह गलत है। मैं इसका विरोध करती हूं।
हरदोई से भाजपा सांसद अंशुल वर्मा ने Sawarn aayog की बात करते हुए कहा कि सवर्ण आयोग का गठन होना चाहिये। वह इसका समर्थन करते हैं। वहीं, स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी रहे हरदोई के पूर्व विधायक गंगा सिंह चौहान ने एससी-एसटी एक्ट का जोरदार विरोध करते हुए देशव्यापी आंदोलन की बात कही है। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी एक्ट और आरक्षण पर सरकार का फैसला पूरी तरह से गलत और सवर्ण विरोधी है। बीजेपी नेता ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट और आरक्षण के खिलाफ जनमत जुटाकर वह जिले से लेकर देशव्यापी आंदोलन करेंगे।
सवर्णों के रुख से बीजेपी में हड़कंप
'सबका साथ सबका विकास' नारे के साथ बीजेपी ने दलितों- पिछड़ों और आदिवासियों को लुभाने के लिये कई फैसले लिये। इनमें एससी-एसटी एक्ट, पदोन्नति में आरक्षण, 2021 पिछड़े वर्ग की अलग से जनगणना जैसे कई बड़े कदम शामिल हैं। आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट जैसे फैसलों पर सवर्ण वर्ग नाराज है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कहीं ऐसा न हो कि अन्य को साधने के चक्कर में 2019 से पहले बीजेपी अपने मजबूत वोट बैंक को ही खो दे? सवर्णों के रुख से भाजपाइयों में भी बेचैनी है। क्योंकि अभी तक सवर्ण वोटर को बीजेपी का कोर वोटर माना जाता रहा है। सूत्रों की मानें तो इस बार की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सवर्ण वोटर्स की नाराजगी मेन मुद्दा रहने वाला है।
उत्तर प्रदेश का जातीय गणित
उत्तर प्रदेश में करीब 18-20 प्रतिशत सवर्ण मतदाता हैं। इनमें सबसे ज्यादा तादाद ब्राम्हणों (8-9 फीसदी) की है, जबकि राजपूत 4-5 फीसदी और वैश्य कुल आबादी का करीब 3-4 फीसदी हैं। सूबे में 42-45 प्रतिशत ओबीसी और 21-22 फीसदी दलित, 16-18 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। जातिगत आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश में 49 जिले ऐसे हैं, जहां सबसे ज्यादा संख्या दलित मतदाताओं की है। ऐसे हालातों में पार्टी आलाकमान के सामने दोहरी चुनौती है कि वह पहले अपना घर संभालें या फिर उत्तर प्रदेश में एकजुट होकर विपक्ष से निपटने की रणनीति बनायें।
Updated on:
05 Sept 2018 12:03 pm
Published on:
04 Sept 2018 02:27 pm
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