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Brahmin Vote Bank: यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक पर सियासी संग्राम, भाजपा-बसपा-सपा-कांग्रेस आमने-सामने

Brahmin Power Play: उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘ब्राह्मण पावर प्ले’ की शुरुआत हो चुकी है। भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश में जुटी हैं। बैठकों, सम्मेलनों और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के जरिए सभी दल आगामी चुनावों से पहले अपने-अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में लगे हैं।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Feb 20, 2026

भाजपा, बसपा और कांग्रेस के साथ सपा भी सक्रिय; ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कवायद तेज (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

भाजपा, बसपा और कांग्रेस के साथ सपा भी सक्रिय; ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कवायद तेज (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

Brahmin Power Play Begins in UP: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ‘ब्राह्मण पावर प्ले’ की चर्चा तेज हो गई है। आगामी चुनावी परिदृश्य को देखते हुए राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर सक्रिय हो गई हैं। भाजपा, बसपा और कांग्रेस के बीच ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर प्रतिस्पर्धा साफ दिखाई दे रही है, वहीं समाजवादी पार्टी भी इस समीकरण से खुद को दूर नहीं रखना चाहती।

हाल ही में ब्राह्मण विधायकों की बैठक और उससे जुड़े राजनीतिक संदेशों के बाद प्रदेश की सियासत में नए समीकरण बनते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ब्राह्मण समुदाय, जो परंपरागत रूप से राज्य की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है, आगामी चुनावों में निर्णायक साबित हो सकता है।

भाजपा की सक्रियता

प्रदेश के उपमुख्यमंत्री Brajesh Pathak ने हाल ही में धार्मिक अनुष्ठान के दौरान बटुकों का तिलक कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। इसे भाजपा की ओर से ब्राह्मण समाज के प्रति सम्मान और जुड़ाव के प्रतीकात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा के भीतर ब्राह्मण नेतृत्व की मौजूदगी को भी प्रमुखता से रेखांकित किया जा रहा है। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि ब्राह्मण मतदाता भाजपा के पारंपरिक समर्थकों में शामिल रहे हैं, लेकिन बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच इस आधार को और मजबूत करना जरूरी है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, भाजपा का प्रयास है कि संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर ब्राह्मण चेहरों को प्रमुखता देकर संतुलन का संदेश दिया जाए।

बसपा की रणनीति: सामाजिक संतुलन की वापसी

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो Mayawati ने कई मौकों पर ब्राह्मण समाज के प्रति खुलकर समर्थन जताया है। बसपा पहले भी ‘ब्राह्मण-दलित’ सामाजिक समीकरण के सहारे सत्ता में आ चुकी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बसपा एक बार फिर उसी सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को सक्रिय करने की कोशिश कर रही है। पार्टी के कार्यक्रमों और बयानों में ब्राह्मण समाज के सम्मान और भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है। वरिष्ठ राजनीतिक मनोज श्रीवास्तव  का मानना है कि बसपा की रणनीति का उद्देश्य पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखते हुए नए सामाजिक गठजोड़ तैयार करना है।

सपा की सक्रिय भागीदारी

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष Akhilesh Yadav भी इस सियासी समीकरण से दूरी नहीं बनाए हुए हैं। सपा ने भी ब्राह्मण नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ संवाद बढ़ाने की पहल की है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, सपा का प्रयास है कि वह ‘समाज के सभी वर्गों’ को साथ लेकर चलने का संदेश दे। ब्राह्मण सम्मेलन और प्रतिनिधि बैठकों के जरिए पार्टी अपने आधार का विस्तार करना चाहती है। कहना है कि सपा की रणनीति सामाजिक संतुलन और व्यापक समर्थन हासिल करने की दिशा में है।

कांग्रेस की भूमिका

हालांकि चर्चा में मुख्य रूप से भाजपा और बसपा की सक्रियता दिखाई दे रही है, लेकिन कांग्रेस भी इस होड़ से बाहर नहीं है। पार्टी के नेता लगातार सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के मुद्दों को उठा रहे हैं। कांग्रेस का प्रयास है कि वह पारंपरिक वोटरों के साथ-साथ नए सामाजिक वर्गों को भी जोड़ सके। ब्राह्मण समाज के साथ संवाद और संपर्क कार्यक्रमों के जरिए पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में जुटी है।

क्यों अहम है ब्राह्मण वोट बैंक

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक मानी जाती है। ऐतिहासिक रूप से यह वर्ग राजनीति में प्रभावशाली रहा है और विभिन्न दलों को समर्थन देता रहा है। वरिष्ठ राजनीतिक मनोज  का कहना है कि ब्राह्मण मतदाता अक्सर मुद्दों, नेतृत्व और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं। इसलिए उन्हें साधने के लिए प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर प्रयास किए जाते हैं।

ब्राह्मण विधायकों की बैठक का असर

हाल में हुई ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई। इस बैठक को सामाजिक और राजनीतिक संदेश के रूप में देखा गया। बैठक के बाद विभिन्न दलों ने अपने-अपने स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी। इससे संकेत मिलता है कि आगामी चुनावों से पहले सामाजिक समीकरणों को लेकर दल गंभीरता से काम कर रहे हैं।

सियासी संदेश 

 ‘ब्राह्मण पावर प्ले’ केवल प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले महीनों में टिकट वितरण, संगठनात्मक पदों और चुनावी रणनीति में भी इसका असर दिखाई दे सकता है। प्रदेश की राजनीति में सामाजिक संतुलन बनाना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। ऐसे में ब्राह्मण मतदाताओं को साथ लाने की कोशिशें आगामी चुनावी परिदृश्य को प्रभावित कर सकती हैं।