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केजीएमयू के डॉक्टरों ने ढूंढा ब्लड कैंसर का इलाज, बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत खत्म

अब ब्लड कैंसर से निपटने के लिए केजीएमयू के डॉक्टरों ने ब्लड कैंसर का इलाज खोज निकाला है।

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KGMU doctors find blood cancer treatment

केजीएमयू के डॉक्टरों ने ढूंढा ब्लड कैंसर का इलाज, बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत खत्म

लखनऊ. अगर किसी व्यक्ति को ब्लड कैंसर और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहे है तो उसे घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। अब ब्लड कैंसर से निपटने के लिए केजीएमयू के डॉक्टरों ने ब्लड कैंसर का इलाज खोज निकाला है। जिससे ब्लड कैंसर और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों पर लगाम लगाई जे सकेगी।

नहीं पड़ेगी बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत

केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च सेंटर के डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया है कि उन्होंने ब्लड कैंसर के इलाज के लिए एक ऐसे जीन की खोज की है जो ब्लड कैंसर और अप्लास्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की सेहत में तेजी से सुधार लाएगा और दोबारा बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

शोध के दौरान लिए जीन वाले और बिना जीन वाले चूहे

डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कि शोध के दौरान ईड-वन जीन वाले और बिना जीन वाले चूहे लिए गए। दोनों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। 20-20 हफ्ते के अंतराल पर प्रक्रिया चार बार की गई। इसमें सामने आया कि ईड-वन जीन वाले चूहे 80 हफ्ते और बिना ईड-वन जीन वाले चूहे 122 हफ्ते तक जीवित रहे। पता चला कि ईड-वन जीन को नियंत्रित किया जाए तो स्टेम सेल तेजी से बनता है। इससे मरीज के स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती है।

ब्लड कैंसर के मामले लगातार बढ़ते जा रहे

इसके साथ ही बताया कि ब्लड कैंसर के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं और ज्यादातर बच्चे इस बीमारी की चपेट में आते हैं। इस बीमारी में दर्द के साथ इलाज करवाने में भी काफी दुश्वारियां होती जा रही हैं। इसी तरह अप्लास्टिक एनीमिया के केस भी दिन व दिन बढ़ते जा रहे हैं। इस बीमारी में खून बनना पूरी तरह से बंद हो जाता है। दोनों बीमारियों का इलाज स्टेम सेल थेरेपी के माध्यम से होता है। इस थेरेपी में बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है। कई मामलों में ईड-वन जीन के कारण स्टेम सेल कारगर नहीं हो पाती है। एक बार बोन मैरो ट्रांसप्लांट में 8 से 12 लाख रुपये तक खर्च होते हैं। यह जीन कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने में मदद करता है और बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद भी इनके खत्म होने की रफ्तार धीमी कर देता है। इस कारण मरीज को दो से तीन बार बोन मैरो ट्रांसप्लांट करवाना पड़ता था।