
केजीएमयू में करोड़ों की दवा घोटाले का खुलासा
KGMU Medicine Scam: केजीएमयू के यूरोलॉजी विभाग में असाध्य रोग योजना के तहत करोड़ों रुपये के दवा घोटाले का खुलासा होने के बाद हड़कंप मच गया है। जांच में सामने आया है कि फर्जी मरीजों के नाम पर महंगी दवाएं खरीदकर उन्हें बाजार में खपाने का खेल लंबे समय से चल रहा था। मामले की जांच करने वाली समिति ने चार कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की सिफारिश की है। इनमें एक नियमित फार्मासिस्ट और तीन संविदा कर्मचारी शामिल हैं। मंगलवार को आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
जानकारी के अनुसार, केजीएमयू के यूरोलॉजी विभाग में असाध्य रोग योजना के तहत गरीब और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को मुफ्त इलाज और दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। पिछले वर्ष इस योजना के अंतर्गत हर महीने करीब 10 लाख रुपये की दवाएं खरीदी जाती थीं। लेकिन वर्ष 2026 की शुरुआत के साथ ही दवा खरीद का बजट अचानक तीन से चार गुना तक बढ़ गया। बीते महीने लगभग 45 लाख रुपये की दवाओं की खरीद दर्ज की गई, जिसने प्रशासन का ध्यान अपनी ओर खींचा।
महंगी कैंसर, किडनी और अन्य गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की असामान्य खपत को देखकर अधिकारियों को संदेह हुआ। इसके बाद जिन मरीजों के नाम पर दवाएं खरीदी गई थीं, उनके उपचार से जुड़े दस्तावेजों की जांच शुरू की गई। शुरुआती जांच में ही कई रिकॉर्ड संदिग्ध पाए गए और बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता की आशंका सामने आई। मामले की जानकारी तत्काल कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद को दी गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कुलपति ने डीन पैरामेडिकल डॉ. केके सिंह की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति में उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. श्वेता पांडेय, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुरेश कुमार, डॉ. दुर्गेश तथा वित्त नियंत्रक संतोष शर्मा को शामिल किया गया। विस्तृत जांच के दौरान समिति को रिकॉर्ड, दवा वितरण और मरीजों के दस्तावेजों में कई गंभीर खामियां मिलीं।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, असाध्य रोग योजना के तहत करीब 2.5 करोड़ रुपये की दवाओं में घालमेल किया गया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है कि योजना का लाभ वास्तविक मरीजों तक पहुंचाने के बजाय फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से दवाओं की खरीद और वितरण दिखाया गया। रिपोर्ट के आधार पर संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
अधिकारियों के मुताबिक घोटाले को अंजाम देने के लिए एक सुनियोजित तंत्र विकसित किया गया था। सबसे पहले असाध्य योजना में पहले से पंजीकृत मरीजों के यूएचआईडी नंबर का उपयोग कर फर्जी ओपीडी पर्चे तैयार किए जाते थे। इसके बाद उन पर्चों पर महंगी कैंसर और अन्य विशेष दवाएं लिखी जाती थीं। फिर दवा की मांग का इंडेंट हॉस्पिटल रिवॉल्विंग फंड कार्यालय को भेजा जाता था, जहां से खरीद प्रक्रिया पूरी की जाती थी।
दवाएं अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें मरीज तक पहुंचाने के बजाय सीधे स्टोर से निकाल लिया जाता था। रिकॉर्ड में मरीज को भर्ती दिखाकर दवाओं की खपत दर्शाई जाती थी, जबकि वास्तविकता में संबंधित मरीजों को इन दवाओं की जानकारी तक नहीं होती थी। आशंका है कि बाद में इन दवाओं को निजी स्तर पर बाजार में बेच दिया जाता था। हालांकि दवाएं कहां और किन माध्यमों से बेची गईं, इसकी जांच अभी जारी है।
जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे नेटवर्क में किसी डॉक्टर या अन्य अधिकारी की भूमिका थी या नहीं। यदि जांच में किसी चिकित्सक या वरिष्ठ कर्मचारी की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल समिति की रिपोर्ट के आधार पर चार कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की तैयारी पूरी कर ली गई है।
गरीब मरीजों के इलाज के लिए बनाई गई असाध्य रोग योजना में सामने आए इस घोटाले ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपये की दवाओं के कथित दुरुपयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि समय रहते अनियमितताओं की पहचान न होती तो सरकारी धन और मरीजों के अधिकारों को और बड़ा नुकसान हो सकता था। अब सभी की नजर आगे होने वाली पुलिस जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।
Published on:
02 Jun 2026 10:25 am
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