
nawabon ka shahar
रुचि शर्मा
लखनऊ. यूं तो हमारा देश विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों का समागम है। यहां पर आप जैसे -जैसे दूरी तय करते जाते हैं, बोली, पहनावा, रहन-सहन और खान पान में बदलाव को करीब से महसूस करते जाते हैं। लेकिन इन तमाम तरह की संस्कृतियों में जो मिठास आपको लखनऊ की संस्कृति में देखने को मिलेगी वो कहीं और नहीं है। यहां कि आबोहवा सुकून का अहसास तो कराती ही है यहां कि मधुर बोली और 'पहले आप' 'पहले आप' की भावना अापके मन जो मिठास घोलती है, उसे आप ताउम्र नहीं भुला सकते। आप जैसे जैसे इस शहर की गहराई में उतरते जाते हैं आपको अहसास होने लगता है कि शहर -ए-लखनऊ को नफासत और नजाकत का शहर क्यूं कहा जाता है। पुराने लखनऊ में गंगा-जमुनी तहजीब को करीब से देखा जा सकता है।
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'तू' अौर 'मैं' नहीं 'आप' अौर 'हम' हैं
लखनवी संस्कृति के जानकार व लखनऊविद् नाम से मशहूर इतिहासकार योगेश प्रवीन कहते हैं कि यहां तू और मैं नहीं, आप और हम हैं। वे कहते हैं कि अलग अलग जिलों की अलग- अलग भाषा है। दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए 'पहले आप' के कहीं दर्शन नहीं होते। यहां की संस्कृति एक अलग ही रंग में रंगी है। यहां का दर्शन है मैं, मैं और सिर्फ मैं। पहले मेरा काम होना चाहिए, मुझे सबसे तेज और सबसे आगे रहना है, मेरा ऑर्डर है तो पहले मुझे सर्व करो। मैं रूपी यह अंहकार तमाम छोटी-छोटी चीज़ों में दिखाई देता है, जबकि लखनऊ के लोगों में ऐसा नहीं दिखाई देता है।
पहले आप से प्रेरित है कोविंद
बताते चलें कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी लखनवी तहजीब के कायल हैं। पिछले दिनों अपने गृह राज्य के दौरे पर आए कोविंद ने दिल खोलकर लखनवी संस्कृति का तारीफ की। उन्होंने कहा कि लखनऊ की 'पहले आप' की 'तहजीब' समाज के हर व्यक्ति को आगे बढऩे का मौका देने के लिए प्रेरित करती है। कहा कि 'पहले आप' का विश्लेषण किया जाए तो समाज के हर व्यक्ति को आगे बढऩे के लिए कहा जाता है।
Updated on:
03 Oct 2017 03:22 pm
Published on:
03 Oct 2017 02:06 pm
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