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राजधानी आई, वंदे भारत आई… फिर भी नहीं घटा लखनऊ मेल का क्रेज; आखिर क्यों?

Lucknow Mail: जहां आज का दौर 'हाई-स्पीड' और 'सेमी-हाई-स्पीड' ट्रेनों का है, वहां लखनऊ मेल अपनी सादगी और भरोसे के दम पर आज भी पटरियों की रानी बनी हुई है। जानते हैं 103 साल पुराने लखनऊ मेल का इतिहास।

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लखनऊ

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Aman Pandey

May 15, 2026

Lucknow Mail, 12229 Lucknow Mail, Charbagh Railway Station, Indian Railways

लखनऊ मेल। PC: Wikipedia

भारतीय रेलवे के मानचित्र पर हजारों ट्रेनें दौड़ती हैं, लेकिन कुछ का नाम लेते ही जहन में पटरी की गड़गड़ाहट नहीं, बल्कि यादों का एक कारवां चलने लगता है। दिल्ली और लखनऊ के बीच चलने वाली 'लखनऊ मेल' (12229/12230) ऐसी ही एक गौरवशाली परंपरा का नाम है। राजधानी, शताब्दी और वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों के दौर में भी इस ट्रेन का जादू आज भी बरकरार है।

1923 से अब तक

लखनऊ मेल का इतिहास करीब 103 साल पुराना है। साल 1923, देश में अंग्रेजी हुकूमत थी। रेलवे तेजी से फैल रहा था, लेकिन लंबी दूरी की आरामदायक रात वाली ट्रेनों की संख्या बहुत कम थी। उसी दौर में अवध की राजधानी लखनऊ को दिल्ली से जोड़ने के लिए एक ट्रेन शुरू हुई। नाम था- लखनऊ एक्सप्रेस। तब यह नवाबों, ताल्लुकदारों और अंग्रेज अफसरों की पसंदीदा सवारी हुआ करती थी। फिर 1956 आया। भारतीय रेल नए दौर में प्रवेश कर रही थी। उसी दौरान इसका नाम बदलकर लखनऊ मेल कर दिया गया। धीरे-धीरे यह नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि लोगों ने इसे “प्राइड ऑफ लखनऊ” कहना शुरू कर दिया।

वो ट्रेन जिसमें आधा उत्तर प्रदेश चढ़ता है

दिल्ली-लखनऊ रूट देश के सबसे व्यस्त रेल कॉरिडोर में गिना जाता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि तेज और आधुनिक ट्रेनों के आने के बाद भी लखनऊ मेल की मांग कम नहीं हुई। कारण सिर्फ स्पीड नहीं है। यह ट्रेन एक सामाजिक पैटर्न का हिस्सा बन चुकी है। प्रतियोगी परीक्षा देने वाले छात्र, इलाज के लिए दिल्ली जाने वाले परिवार, सरकारी कर्मचारी, कारोबारी, रोजगार के लिए आने-जाने वाले लोग और त्योहारों में घर लौटने वाले प्रवासी इन सबकी यादों में कहीं न कहीं लखनऊ मेल मौजूद है।

रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, इस ट्रेन की वेटिंग लिस्ट सामान्य दिनों में भी लंबी रहती है, जबकि त्योहारों और छुट्टियों में कन्फर्म टिकट मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है।

रात की ट्रेन, सुबह की दिल्ली

Charbagh Railway Station से रात में 10 बजे रवाना होकर सुबह 6: 55 बजे New Delhi Railway Station पहुंचना, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। करीब 491 किलोमीटर का सफर यह ट्रेन लगभग 8 घंटे 55 मिनट में पूरा करती है। रास्ते में हरदोई, शाहजहांपुर, बरेली, रामपुर, मुरादाबाद, हापुड़ और गाजियाबाद जैसे शहरों को जोड़ते हुए यह ट्रेन सिर्फ यात्रियों को नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के आर्थिक गलियारे को भी जोड़ती है।

दिलचस्प बात यह है कि जब इसे सुपरफास्ट श्रेणी में शामिल किया गया, तब कई ट्रेनों के स्टॉपेज कम किए जा रहे थे। लेकिन लखनऊ मेल के पुराने ठहराव लगभग जस के तस रहे। रेलवे जानता था कि यह ट्रेन सिर्फ “पॉइंट A टू पॉइंट B” वाली सेवा नहीं है।

गुणवत्ता में भी अव्वल

लखनऊ मेल को भोपाल एक्सप्रेस के बाद ISO 9000 सर्टिफिकेट मिला है, जो यात्री सुविधाओं और सेवाओं की गुणवत्ता का प्रमाण है। यह भारतीय रेलवे की पहली LHB (लिंके-हॉफमैन-बुश) ट्रेन भी है जो स्थायी रूप से पूरे 24 कोच के साथ चलती है। 2005-06 के रेल बजट में इसे सुपरफास्ट श्रेणी में शामिल किया गया और ट्रेन नंबर 12229/12230 आवंटित हुआ।

जब स्टेशन बदला तो यात्रियों ने विरोध कर दिया

साल 2018 में रेलवे ने इसे Lucknow Junction Railway Station शिफ्ट कर दिया। प्रशासनिक कारण थे, लेकिन नियमित यात्रियों के लिए यह भावनात्मक झटका था। कई यात्रियों ने नाराजगी जताई। पुराने यात्रियों का कहना था कि लखनऊ मेल की असली पहचान चारबाग से है। फिर 15 अगस्त 2024 को ट्रेन की वापसी हुई। एक बार फिर यह चारबाग से चलने लगी।

कई परिवारों की 3 पीढ़ियों ने किया यात्रा

कई परिवारों में दादा इसी ट्रेन से दिल्ली नौकरी करने गए थे। फिर बेटों ने उसी ट्रेन से पढ़ाई के लिए सफर किया। अब पोते-पोतियां इंटरव्यू और कॉलेज एडमिशन के लिए इसी ट्रेन में बैठते हैं। शायद यही वजह है कि लखनऊ मेल आज भी सिर्फ एक ट्रेन नहीं लगती। यह उत्तर प्रदेश की सामूहिक स्मृति का हिस्सा महसूस होती है।