कुपोषण यूपी के लिए बड़ा चैलेंज - नहीं बढ़ रही बच्चों की लम्बाई, हो रहे अकाल मौत के शिकार

Laxmi Narayan

Publish: Sep, 17 2017 03:59:29 (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
कुपोषण यूपी के लिए बड़ा चैलेंज - नहीं बढ़ रही बच्चों की लम्बाई, हो रहे अकाल मौत के शिकार

कुपोषण से पांच साल से कम उम्र के 3.8 लाख बच्चों की मौतें हर साल उत्तर प्रदेश में हो रही हैं।

लखनऊ. विश्व स्तर पर किये गए एक ताजा शोध में दुनिया की हर पांचवी मौत में से एक मौत के लिए खानपान की गुणवत्ता और उनमें पोषक तत्वों की कमी को जिम्मेदार बताया गया है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के इस शोध में भारत, चीन जैसे देशों को भी शामिल किया गया था। इस नए अध्ययन के बाद यह बहस शुरू हो सकती है दुनिया भर में पोषण स्तर को बेहतर बनाने के लिए जो प्रयास हुए हैं, उनमें कितनी सफलता मिली है। वर्तमान स्थिति यह है कि भारत में हर साल कुपोषण से पांच साल से कम उम्र के दस लाख बच्चों की मौत हो जाती है। इन मौतों में से अकेले हर साल 3.8 लाख मौतें उत्तर प्रदेश में हो रही हैं।

कुपोषण से मौत में यूपी है आगे

उत्तर प्रदेश में कुपोषण से होने वाली मौतें सबसे अधिक हैं। प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के 3 लाख 80 हज़ार बच्चे हर साल मौत के मुँह में समा जाते हैं। इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो सामने आता है कि हर रोज 650 बच्चों की कुपोषण से मौत हो जाती है। उत्तर प्रदेश में मौतों का यह आंकड़ा इस समस्या की भयावहता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारकों की मूल वजह बताता हुआ दिखाई देता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वेक्षण के आंकड़े भी यूपी की चिंताजनक तस्वीर सामने रखते हैं। उत्तर प्रदेश में 5 साल तक की उम्र के 46.3 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन का शिकार हैं। इस मामले में बिहार के बाद उत्तर प्रदेश देश में दूसरे पायदान पर है।

राजनैतिक दलों ने नहीं बनाया एजेंडा

यूपी में कुपोषण से होने वाली मौतें कभी राजनैतिक दलों के एजेंडे पर नहीं रही। देश के किसी भी हिस्से में आमतौर पर इस विषय पर चर्चा कम ही देखने को मिली। इस विषय पर न तो कभी व्यापक चर्चा हुई न ही इन आकड़ों को लेकर कभी विधान सभा या लोकसभा में हंगामा हुआ। मौतों के इस भयावह आंकड़ों पर राजनैतिक दलों में एक तरह की मौन सहमति और मिलीजुली चुप्पी जैसी दिखाई देती है। दरअसल कुपोषण से होने वाली मौतें एक तरफ सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के साथ आम नागरिकों को उपलब्ध होने वाली पोषक तत्वों की कमी की ओर संकेत करती है तो दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर किये जा रहे दावों पर भी सवाल खड़े करती है।

योगेंद्र यादव की रिपोर्ट पर हुआ था हंगामा

वर्ष 2016 में स्वराज अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव ने बुंदेलखंड को लेकर एक सर्वेक्षण किया था जिसके जारी होने के बाद काफी विवाद हुआ था। बुंदेलखंड के सात जिलों में कई गैर सरकारी संस्थाओं की मदद से एकत्र किये गए आंकड़े के हवाले से कहा गया था कि 8 माह के दौरान बुंदेलखंड के 53 प्रतिशत गरीब परिवारों ने दाल नहीं खायी जबकि 69 प्रतिशत ने दूध नहीं पिया। रिपोर्ट के आधार पर दावा किया गया था कि बुंदेलखंड के 38 प्रतिशत गाँव में भूख की वजह से लोगों की मौत हुई। यह भी दावा किया गया था कि 60 प्रतिशत परिवारों में गेंहू-चावल की जगह मोटे अनाज और आलू का प्रयोग किया गया और साथ ही हर छठे परिवार ने घास की रोटी खाई। इस रिपोर्ट के बाद हंगामा मचा और सरकार ने रिपोर्ट को खारिज कर दिया था लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं और कुपोषण के मामले में बदहाली बुंदेलखंड की पहचान बनी रही।

कुपोषण के खिलाफ जंग

सरकार कुपोषण को लेकर लगातार अभियान चलाती रही हैं। बकायदा प्रदेश में राज्य पोषण मिशन अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग के अफसर और जिले के अफसर किसी कुपोषण ग्रस्त गाँव को गोद लेते हैं और वहां की महिलाओं व बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाती है। गर्भवती महिलाओं की विशेष रूप से देखभाल की व्यवस्था और उसे दिए जाने वाले पोषक तत्वों की निगरानी होती है। लखनऊ के सीएमओ डॉ जीएस बाजपेई कहते हैं कि मुख्य रूप से महिलाओं और नवजात बच्चों में कुपोषण की समस्या सामने आती है। महिलाओं के गर्भवती होने के बाद से ही उनके टीकाकरण और बच्चे के जन्म तक इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उसे संतुलित आहार उपलब्ध कराया जाए। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियानों के माध्यम से भी लोगों को संतुलित आहार के बारे में जानकारी दी जाती है।

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