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हजारों ख्वाहिशें ऐसी, रूह में उतर जाती है मिर्जा गालिब की शायरी, आज है इनकी जयंती

आम आदमी के शायर कहे जाने वाले मिर्जा गालिब उर्फ असद उल्लाह बेग खान का बुधवार 27 दिसम्बर को 220 वां जन्मदिन है।

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mirza ghalib

करिश्मा लालवानी

लखनऊ. सिर पर लंबी सी टोपी, दाढ़ी और चर्र मर्र करती जूतीयां। कुछ ऐसी थी दिल्ली के दरबार में शाही शायर रहे मिर्जा गालिब की। गालिब सिर्फ एक नाम ही नहीं है बल्कि उर्दू की शायरी में वो ऐतिहासिक नाम हैं, जिन्हें आज भी याद किया जाता है औऱ किया जाता रहेगा। आम आदमी के शायर कहे जाने वाले मिर्जा गालिब उर्फ असद उल्लाह बेग खान का बुधवार 27 दिसम्बर को 220 वां जन्मदिन है। इस मौके पर उन्हें गूगल ने अपना डूडल समर्पित किया है। आगरा में जन्मे मिर्जा गालिब को आज भी उनकी कविताओं के लिए याद किया जाता है। मिर्जा गालिब का लखनऊ कनेक्शन भी रहा है। उनके पिता मिर्जा अब्दुल्ला वेग ने लखनऊ के नवाब के यहां काम किया है।

अपनी शायरी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले मिर्जा गालिब इतिहास के पन्नों में ऐसे शायर हैं, जिनकी कविताओं का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। गालिब को मुगल काल का आखिरी शायर कहा जाता है। सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में मिर्जा गालिब का जन्म हुआ था। उनका जन्म तब हुआ था जब मुगल कमजोर हो चुके थे और पूरे देश पर अंग्रेजों का राज चलता था।

बॉलीवुड और टेलीविजन में मिर्जा गालिब का काम

मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रथम भाषा उर्दू थी लेकिन उन्होंने उर्दू के साथ-साथ फारसी में भी कई शेर लिखे थे। ग़ालिब की कविताओं पर भारत और पाकिस्तान में कई नाटक भी बन चुके हैं। बॉलीवुड और टेलीविजन में उनके कामों की हालांकि ज्यादा चर्चा नहीं हुई। बॉलीवुड में सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्जा गालिब (1954)’ यादगार थी और टेलीविजन पर गुलजार का बनाया गया टीवी सीरियल ‘मिर्जा गालिब (1988)’ जेहन में रच-बस गया। फिल्म में जहां भारत भूषण ने लीड किरदार को निभाया तो टीवी पर नसीरूद्दीन शाह ने गालिब को छोटे परदे पर जिंदा किया।

मिर्जा गालिब के मशहूर शेर

“हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले”

“न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझको होनी ने, न होता मैं तो क्या होता?”

ऐसा था संघर्ष

आज मिर्जा गालिब के 220वें जन्मदिन पर गूगल ने उन्हें अपना डूडल समर्पित किया है। गूगल ने अपने एक पोस्ट में इस बात का वर्णन किया है कि उनकी (गालिब) की जिंदगी किसी मुसीबत से कम नहीं थी। छोटी उम्र में अपने पिता को खोया, अपने सातों नवजात बच्चों को खो देना औऱ उस दौरान राजनितिक उथल-पुथल की वजह से मुगलों का शाषन काल कमजोर पड़ना। एक मशहूर शायर गालिब की परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुई थीं। आर्थिक स्थिती से कमजोर रहे मिर्जा गालिब का रोजगार उनके दोस्तों पर निर्भर था।

इऩ सबके बावजूद गालिब ने हार नहीं मानी और उपनी अनोखी शायरी से लोगों के दिलों पर राज किया।