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Kulhad Ki Chai: कुल्हड़ की चाय बदलने वाली है किस्मत, देखें किसके बहुरने वाले हैं दिन?

रेलवे स्टेशनों (Railway Station) पर अब सिर्फ कुल्हड़ की चाय (Kulhad Ki Chai) मिलेगी। केन्द्र सरकार के इस फैसले से इस व्यवसाय से जुड़े लाखों परिवारों की किस्मत बदल जाएगी। कुम्हारों और मिट्टी के बर्तन बनाने के रोजगार से जुड़े लोगों को सीधा फायदा होगा। इसके साथ ही इन कुल्हड़ों से पर्यावरण को भी कोई नुकसान नहीं होगा।

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लखनऊ. कुम्हार और मिट्टी के बर्तन बनाने के रोजगार से जुड़े लोगों के लिए इस बार की दीवाली अच्छी होने वाली है। दरअसल अब देश भर के रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाली चाय अब प्लास्टिक और कागज़ के कपों के बजाय एक बार फिर मिट्टी के कुल्हड़ों में मिलेगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को कहा कि देश के सभी रेलवे स्‍टेशनों पर प्‍लास्टिक के कपों की बजाय अब मिट्टी के कुल्‍हड़ में चाय देने की व्यवस्था की जाएगी।

गुजरात के गाँधीनगर रेलवे स्टेशन पर एक टी-स्टाल का उद्घाटन करते हुए अमित शाह ने कहा कि आप लोग मिट्टी के कुल्‍हड़ बनाओ, देश के रेलवे स्‍टेशनों पर प्‍लास्टिक के कप बंद करके धीरे-धीरे मिट्टी के कुल्‍हड़ में चाय बेचने की व्‍यवस्‍था करेंगे ताकि प्रदूषण कम हो तथा कुटीर उद्योग से जुड़े लोगों को रोजगार मिल सके।

यूपी के करीब लाखों कुम्हारों को होगा फायदा

हालाँकि पूरे देश में कुम्हार जाति या फिर मिट्टी के बर्तन बनाने के रोजगार से कितने लोग जुड़े हैं इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा तो नहीं है। मगर भारत के सभी राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या सबसे अधिक है। एक गैर-सरकारी आँकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब पचास लाख से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस रोजगार से जुड़े हैं। ज़ाहिर सी बात है कि इसका सर्वाधिक फायदा यूपी के कुम्हारो और इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को होगा।

यूपी में रोजाना लाखों यात्री करते हैं ट्रेनों से सफ़र

उत्तर प्रदेश में छोटे-बड़े सभी मिलाकर करीब 1000 से ज्यादा रेलवे स्टेशन हैं, जिनमें 80 जंक्शन हैं। इन रेलवे स्टेशनों से रोजाना लाखों की संख्या में यात्री ट्रेनों से सफर करते हैं। अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कुल्हड़ों की माँग कितनी बढ़ने वाली है।

2004 में लालू यादव ने की थी शुरुआत

जब लालू प्रसाद यादव रेलमंत्री बने तो साल 2004 में उन्होंने रेलवे में कुल्हड़ में चाय के इस्तेमाल को मंजूरी दी थी। हाँलाकि बाद में प्लास्टिक और कागज के कपों ने एक बार फिर से कुल्हड़ का स्थान ले लिया।

पर्यावरण के भी अनुकूल हैं मिट्टी के कुल्हड़

कुल्हड़ पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। इनको प्रयोग करने के बाद अगर आप कहीं फेंक भी देते हैं तो ये वापस मिट्टी में मिल जाते हैं। मगर प्लास्टिक के कप के साथ ऐसा नहीं था।

कोरोना से भुखमरी के कगार पर पहुँच गये थे कई परिवार

कोरोना महामारी में लॉकडाउन के चलते मिट्टी के बर्तन बनाने और बेचने वाले कई परिवार भुखमरी के कगार पर पहुँच गये थे।

युवाओं की भी पसंद है कुल्हड़ वाली चाय

आजकल मिट्टी के कुल्हड़ वाली चाय युवाओं की भी पसंद बनती जा रही है। बड़े-छोटे सभी शहरों के ज्यादातर टी स्टाल पर लिखा मिलता है कुल्हड़ वाली चाय, और महंगी होने के युवा बकायदा ऑर्डर देकर कुल्हड़ की में चाय लेते हैं।

तंदूरी चाय का प्रचलन

चाय में मिट्टी की सोंधी खुशबू और उसका टेस्ट देने वाली तंदूरी चाय भी आजकल बेहद प्रचलन में है। इसने भी मिट्टी के बर्तन के कारोबार से जुड़े लोगों को सहारा देने का काम किया है।