
आज विधानसभा सत्र में सीएम योगी ने उठाया शाहबानो प्रकरण, PC- Patrika
साल 1985 में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने पूरे देश को हिला दिया। इंदौर की 62 वर्षीय शाहबानो बेगम की कहानी सिर्फ एक तलाकशुदा महिला की गुजारा भत्ता की मांग नहीं थी, बल्कि यह समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code), महिला अधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के बीच टकराव की मिसाल बन गई। इस मामले को लेकर राजीव गांधी सरकार पर आज भी तुष्टीकरण (appeasement) का आरोप लगता है। आज यही मुद्दा यूपी विधानसभा में सीएम योगी आदित्यनाथ ने उठाया। उन्होंने कहा, शाहबानो प्रकरण में आप लोगों ने एक मुस्लिम महिला के साथ जो अन्याय किया था…अगर कांग्रेस ये पाप नहीं करती, मौलवियों के दबाव में नहीं आती, भारत के कानून का सम्मान करके शाहबानो को न्याय दिया होता तो ये दुर्गति नहीं होती…। आइए जानते हैं कि क्या था शाहबानो प्रकरण।
शाहबानो बेगम इंदौर की रहने वाली एक साधारण मुस्लिम महिला थीं। उन्होंने 1932 में वकील मोहम्मद अहमद खान से शादी की थी। इस दांपत्य जीवन से उनके पांच बच्चे हुए तीन बेटे और दो बेटियां। लगभग 43 साल की शादी के बाद 1975 में खान ने शाहबानो को घर से निकाल दिया। 1978 में शाहबानो ने बच्चों के भरण-पोषण के लिए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 125 के तहत कोर्ट में गुजारा भत्ता मांगा।
उसी दौरान मोहम्मद अहमद खान ने त्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) देकर शाहबानो को तलाक दे दिया। उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार इद्दत की अवधि (लगभग 3 महीने) तक ही भरण-पोषण की जिम्मेदारी है, उसके बाद नहीं। उन्होंने महर (3000 रुपये) और इद्दत का भत्ता भी चुका दिया था।
निचली अदालत ने शाहबानो को 25 रुपये महीना देने का आदेश दिया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर 179.20 रुपये प्रति माह कर दिया। खान ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया:
यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक बड़ी जीत माना गया।
फैसले के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने तीखा विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि यह फैसला शरिया कानून में दखलअंदाजी है।
राजीव गांधी सरकार (जिसके पास भारी बहुमत था) शुरू में फैसले का समर्थन करती दिखी, लेकिन मुस्लिम वोटबैंक के दबाव में झुक गई। 1986 में संसद में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पास किया गया।
2019 में मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध लगाकर मुस्लिम महिलाओं को कानूनी सुरक्षा दी, जिसे शाहबानो मामले का सुधार माना जाता है।
शाहबानो मामला आज भी समान नागरिक संहिता की बहस का केंद्र है। यह दिखाता है कि कैसे एक व्यक्तिगत न्याय की लड़ाई राष्ट्रीय राजनीति, धर्म और संविधान के बीच टकराव बन गई। बीजेपी इसे कांग्रेस की वोटबैंक राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस पक्ष इसे जटिल सामाजिक-सांप्रदायिक संतुलन का मामला मानती है।
Updated on:
30 Apr 2026 07:22 pm
Published on:
30 Apr 2026 07:22 pm
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