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सुलतानपुर के 42 गांवों में अभी भी चकबंदी प्रक्रिया अधूरी, 7,160 हजार मुकदमे लंबित, मिल रहीं हैं सिर्फ तारीख पर तारीख

देश की आजादी के बाद सूबे में जिला सुल्तानपुर में चकबंदी प्रक्रिया सबसे पहले शुरू हुई पर 48 वर्ष बीत गए उसके बाद भी जिले में चकबंदी प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं, फैसले के इंतजार में वादी और प्रतिवादी की पीढ़ियां खत्म हो रही हैं। पर फैसला नहीं आ रहा है, अगर कुछ मिल रहा है तो वह तो सिर्फ तारीख पर तारीख।

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सुलतानपुर के 42 गांवों में अभी भी चकबंदी प्रक्रिया अधूरी, 7,160 हजार मुकदमे लंबित, मिल रहीं हैं सिर्फ तारीख पर तारीख

सुलतानपुर के 42 गांवों में अभी भी चकबंदी प्रक्रिया अधूरी, 7,160 हजार मुकदमे लंबित, मिल रहीं हैं सिर्फ तारीख पर तारीख

सुलतानपुर. देश की आजादी के बाद सूबे में जिला सुल्तानपुर में चकबंदी प्रक्रिया सबसे पहले शुरू हुई पर 51 वर्ष बीत गए उसके बाद भी जिले में चकबंदी प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं, फैसले के इंतजार में वादी और प्रतिवादी की पीढ़ियां खत्म हो रही हैं। पर फैसला नहीं आ रहा है, अगर कुछ मिल रहा है तो वह तो सिर्फ तारीख पर तारीख। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी चकबंदी प्रक्रिया में हो रही इस देरी के लिए चिंता जताई है।

यह जानकर आश्चर्य भले हो पर, यह खबर सोलह आने पक्की है कि सुल्तानपुर, सूबे का ऐसा एकलौता जिला है जहां आजादी के बाद चकबंदी प्रक्रिया सबसे पहले शुरू हुई लेकिन, वह आज तक पूरी नहीं हो सकी है। उदाहरण के लिए उपसंचालक चकबंदी के न्यायालय में राजाराम बनाम रामसुंदर आदि का मुकदमा 1972 में शुरू हुआ और आज तक लगातार चल रहा है। इस मुकदमे के दायर करने वाले (वादी मुकदमा) और परिवादी मुकदमा दोनों पक्षों के करीब एक दर्जन लोगों की मृत्यु हो चुकी है, पर अभी मुकदमे में फैसला आने में कितना समय और लगेगा यह निश्चित नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी किसान मुकदमेबाजी के चक्कर में पड़कर परेशान हो रहा है और उसे न्यायालयों से न्याय नहीं मिल रहा है, बल्कि उन्हें मिल रही है तो सिर्फ तारीख पर तारीख

सबसे पहले 1956 में शुरू हुई थी चकबंदी :- अविभाजित सुल्तानपुर जिले में सबसे पहले सुल्तानपुर जिले की मुसाफिरखाना तहसील में वर्ष 1956 में चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुई थी, यह सरकार को पायलट प्रोजेक्ट था। इसके बाद वर्ष 1969 में जिले में चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन 51 वर्षों तक चलने वाली चकबंदी प्रक्रिया का यह सफर किसानों के लिए बेहद पीड़ादायक रहा। 51 वर्षों से चल रही चकबंदी प्रक्रिया की हालत यह है कि अभी भी जिले की तहसीलों के 42 गांवों में चकबंदी प्रक्रिया अधूरी है और किसान मुकदमेबाजी के चक्कर में फंसकर अपना समय और पैसा दोनों बर्बाद कर रहा है ।

पांच वर्ष में चकबंदी :- चकबंदी नियमावली के अनुसार जिस भी गांव में चकबंदी प्रक्रिया शुरू हो, उस गांव में अधिकतम पांच साल के अंदर चकबंदी की सारी प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए लेकिन, जिले के चकबंदी न्यायालयों में 485 मुकदमों में करीब 20 वर्ष बीत गए है। मुकदमे चल रहे हैं। प्रथम चरण की चकबंदी प्रक्रिया 51 वर्षों के बाद भी अधूरी है।

7,160 हजार मुकदमे लंबित :- जिलेभर में चकबंदी के विभिन्न न्यायालयों में 51 वर्षों से 7 हजार 160 मुकदमे लंबित हैं। जिसमें 485 मुकदमे तो 10 वर्षों से लंबित पड़े हैं। पक्षकारों को इन न्यायालयों से मिल रही है सिर्फ तारीख पर तारीख।

चकबंदी प्रक्रिया का उद्देश्य :- चकबंदी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य भूमि की सही पैमाइश, किसानों की जमीनों के रकबों का एकीकरण, सार्वजनिक उपयोग के लिए भूमि का प्रबंधन है। छोटे-छोटे किसानों के आपसी विवाद इसी के तहत निस्तारित किए जाते हैं।

इन गांवों में चकबंदी प्रक्रिया अधूरी :- लम्भुआ के राजापुर, भाटी, गोपालपुर, सहित 15 गांवों में। कादीपुर के पहाड़पुर, खोजापुर, शेरपुर और बल्दीराय के अमुऊ जासरपुर, चंदौरा, धनपतगंज के दर्जनों गांवों सहित सदर में कस्बा समेत दर्जनों गांवों में चकबंदी प्रक्रिया वर्षों से लंबित है।

चकबंदी न्यायालयों में लंबित मामलों के बारे में उपसंचालक चकबंदी अशोक कुमार ने बताया कि ज्यादातर मामलों में लोगों द्वारा पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है। ऐसे में वही मुकदमे दोबारा न्यायलयों में विचार के लिए आ जाते हैं। शासन स्तर से मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए लक्ष्य तय किए गए हैं।