
घने कोहरे में हुए भीषण हादसे के बाद अब तक नहीं मिला कोई सुराग, प्रशासनिक जांच जारी (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Two Weeks After Yamuna Expressway Tragedy: 16 दिसंबर की ठंडी सुबह, घना कोहरा और यमुना एक्सप्रेसवे पर हुआ भीषण हादसा,इस त्रासदी ने जहां 20 लोगों की जान ले ली, वहीं उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के एक परिवार को ऐसी अनिश्चितता में धकेल दिया है, जिससे निकलना उनके लिए असहनीय होता जा रहा है। दो हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन 49 वर्षीय पार्वती देवी का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। न उनका शव मिला, न कोई आधिकारिक पुष्टि-बस सवाल, इंतजार और बढ़ती बेचैनी।
हमीरपुर के नौरंगा गांव निवासी 52 वर्षीय मजदूर गोविंद कुमार की जिंदगी बीते दो हफ्तों से सिर्फ एक सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है-“मेरी पत्नी आखिर कहां है?” उनकी पत्नी पार्वती देवी अपने दो बच्चों, 12 वर्षीय प्राची और 8 वर्षीय सागर, के साथ बस से नोएडा जा रही थीं। वहां उनका बड़ा बेटा आकाश (22) मजदूरी करता है। परिवार नए सिरे से साथ रहने की उम्मीद में सफर पर निकला था, लेकिन यह यात्रा उनकी जिंदगी का सबसे भयावह मोड़ बन गई।
16 दिसंबर की सुबह करीब चार बजे, यमुना एक्सप्रेसवे पर घने कोहरे के कारण 18 वाहनों की भीषण टक्कर हो गई। इस दुर्घटना में 13 वाहन, जिनमें आठ बसें शामिल थीं, आग की चपेट में आ गए। कुछ ही मिनटों में आग की लपटें इतनी तेज हो गईं कि कई लोग बाहर निकल ही नहीं पाए। 20 लोगों की मौत हुई, जिनमें से कई शव बुरी तरह झुलस गए, पहचान से परे। इसी हादसे में पार्वती देवी जिस बस में सवार थीं, वह भी आग की चपेट में आ गई। लेकिन जो कहानी सामने आई है, वह किसी मां की ममता और साहस की मिसाल है।
आकाश बताते हैं कि उनकी मां हादसे के वक्त घायल हो गई थीं। बस के अंदर धुआं भर चुका था, सांस लेना मुश्किल हो रहा था। “मां ने पहले सागर को बाहर निकाला, फिर प्राची किसी तरह कूदकर बाहर आ गई,” आकाश कहते हैं। उनकी बहन प्राची बस के बाहर चीखती रही, लोगों से गुहार लगाती रही कि कोई उनकी मां को बचा ले। लेकिन तभी बस में विस्फोट हुआ और वह आग की लपटों में घिर गई। उसके बाद क्या हुआ-इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
प्रशासन का कहना है कि हादसे में मिले सभी शवों की पहचान कर ली गई है। 15 मामलों में डीएनए जांच के जरिए पहचान की पुष्टि की गई। लेकिन पार्वती देवी का नाम उस सूची में नहीं है। यही बात परिवार की पीड़ा को और गहरा कर देती है।गोविंद कुमार और उनका बेटा आकाश बीते दो हफ्तों से मथुरा के पुलिस थानों, जिला प्रशासन के दफ्तरों और अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। हर जगह एक ही जवाब-“मामला जांच में है।”
आकाश का कहना है कि पुलिस ने चार बार उन्हें बुलाकर डीएनए सैंपल लिए खून, बाल और नाखून के नमूने। लेकिन अब तक यह नहीं बताया गया कि जांच का नतीजा क्या रहा। “हमें कुछ भी स्पष्ट नहीं बताया जा रहा,” वे कहते हैं। परिवार की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वे अपने गांव तक छोड़ आए हैं। “दो हफ्ते हो गए, हम लटके हुए हैं। गांव में लोग तरह-तरह की बातें बना रहे हैं। बदनामी से बचने के लिए पूरा परिवार अब मेरे साथ नोएडा में रह रहा है,” आकाश कहते हैं।
मथुरा ग्रामीण क्षेत्र के अपर पुलिस अधीक्षक सुरेश चंद्र रावत का कहना है कि मामले की जांच जारी है। “हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या पार्वती देवी वाकई उस बस में सवार थीं। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं, कॉल डिटेल रिकॉर्ड देखे जा रहे हैं और जीवित बचे यात्रियों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं,” उन्होंने कहा। पुलिस ने हमीरपुर में भी एक अधिकारी भेजा, जिसने गांव के लोगों, पार्वती के रिश्तेदार और उन्हें बस में बैठाने वाले ऑटो चालक के बयान दर्ज किए हैं।
जिलाधिकारी मथुरा चंद्र प्रकाश सिंह ने बताया कि हादसे में 20 लोगों की मौत हुई थी और सभी शवों की पहचान कर ली गई है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दो परिवार ऐसे हैं, जो दावा कर रहे हैं कि उनके परिजन हादसे में मारे गए, लेकिन शव नहीं मिले। “इन दावों की जांच की जा रही है,” उन्होंने कहा।
सरकार ने हादसे में मृतकों के परिजनों को तीन लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है। लेकिन आकाश का कहना है कि प्रशासन की जांच प्रक्रिया उन्हें ऐसा महसूस करा रही है जैसे वे झूठा दावा कर रहे हों। “ऐसा लगता है जैसे अधिकारी हमें शक की नजर से देख रहे हैं,” वे कहते हैं। आकाश बताते हैं कि हादसे के अगले दिन अधिकारियों ने भरोसा दिलाया था कि 72 घंटे में सभी की पहचान हो जाएगी। “अब दो हफ्ते बीत गए, लेकिन हमारी जिंदगी वहीं की वहीं अटकी हुई है,” वे कहते हैं।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि परिवार को न तो शोक मनाने का मौका मिला है, न ही किसी तरह की closure। पार्वती देवी जिंदा हैं या नहीं इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। एक मजदूर परिवार, जो पहले ही आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से जूझ रहा था, अब मानसिक पीड़ा और अनिश्चितता के अंधेरे में फंसा हुआ है। हर गुजरता दिन उनके लिए उम्मीद और निराशा के बीच झूलता रहता है। यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि सिस्टम के उस खालीपन की भी है, जहां आंकड़ों और फाइलों के बीच इंसानी संवेदनाएं कहीं खो जाती हैं। पार्वती देवी की तलाश अब सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनशीलता की भी परीक्षा बन चुकी है।
Published on:
01 Jan 2026 03:19 pm
बड़ी खबरें
View Allलखनऊ
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
