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सपा को चाहिए कांग्रेस का ‘हाथ’, लेकिन जब-जब हुआ गठबंधन अखिलेश को मिली करारी हार, हर बार नहीं बना समीकरण

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि पार्टी अब नए गठबंधन नहीं करेगी और कांग्रेस के साथ ही 2027 का चुनाव लड़ेगी।
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लखनऊ

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Anuj Singh

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Updated: 13 Apr 2026, 9:42 AM IST

कांग्रेस के साथ ही क्यों टिके अखिलेश?

कांग्रेस के साथ ही क्यों टिके अखिलेश?

UP Politics: राजस्थान के जयपुर में विजन इंडिया कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अब किसी नए दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। मौजूदा गठबंधन यानी कांग्रेस के साथ जो तालमेल है, वही 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी जारी रहेगा। अखिलेश ने साफ किया कि यूपी में अब कोई नया गठबंधन नहीं होगा और पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) समुदाय के आधार पर लड़ाई लड़ी जाएगी। यह बयान ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन हमेशा चर्चा में रहते हैं। लेकिन सपा के इतिहास को देखें, तो गठबंधन कई बार पार्टी को नुकसान ही पहुंचा है।

2017 का सपा-कांग्रेस गठबंधन

2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने मिलकर "यूपी को ये साथ पसंद है" का नारा दिया। सपा और कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा। कांग्रेस को 105 सीटें दी गईं और सपा बाकी पर लड़ी। लेकिन नतीजे बहुत खराब रहे। सपा को सिर्फ 47 सीटें मिलीं और कांग्रेस को 7 सीटें। वहीं भाजपा ने 312 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल कर लिया।
इस गठबंधन में मुख्य समस्या यह रही कि दोनों दलों के वोट बैंक एक-दूसरे में अच्छे से ट्रांसफर नहीं हो पाए। कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल कमजोर रहा। सपा के पारंपरिक वोटरों ने कांग्रेस उम्मीदवारों को उतना समर्थन नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि सपा की सीटें पहले से बहुत कम हो गईं।

2019 का सपा-बसपा गठबंधन

2019 के लोकसभा चुनाव में सपा ने बसपा के साथ गठबंधन किया। दोनों पुरानी विरोधी पार्टियां साथ आईं। इस गठबंधन से बड़ी उम्मीदें थीं कि भाजपा को टक्कर मिलेगी। लेकिन वोट ट्रांसफर ठीक से नहीं हुआ। सपा और बसपा दोनों को नुकसान हुआ। भाजपा ने यूपी में भारी जीत हासिल की। गठबंधन की केमिस्ट्री जमीन पर नहीं बन पाई।

गठबंधन की जमीनी हकीकत

उत्तर प्रदेश में गठबंधन अक्सर कागज पर मजबूत गणित दिखाते हैं। लेकिन असल में 'केमिस्ट्री' यानी दलों के बीच विश्वास और कार्यकर्ताओं का तालमेल बहुत जरूरी होता है। सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच बने अलग-अलग गठबंधन इस बात के उदाहरण हैं कि सिर्फ वोटों की जोड़-तोड़ से चुनाव नहीं जीते जाते। जब वोट बैंक आपस में नहीं मिलते और पुरानी दुश्मनी याद आती है, तो गठबंधन कमजोर पड़ जाता है। 2017 और 2019 के अनुभव बताते हैं कि सपा को इन गठबंधनों से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ। पार्टी की अपनी ताकत घटती दिखी।

फिर भी कांग्रेस के साथ गठबंधन क्यों?

अखिलेश यादव ने अब फिर कांग्रेस के साथ रहने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन का काफी अनुभव है और मौजूदा तालमेल ही आगे चलेगा। शायद अखिलेश को लगता है कि अकेले लड़ना और मुश्किल होगा। लेकिन सपा के पुराने अनुभव सवाल उठाते हैं कि क्या यह फैसला सही साबित होगा? 2027 के चुनाव में भाजपा मजबूत है। अगर गठबंधन में फिर वोट ट्रांसफर और तालमेल की समस्या रही, तो सपा को एक बार फिर नुकसान हो सकता है। राजनीति में गठबंधन गेम चेंजर हो सकते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर अलग होती है।