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…तो इसलिये एकजुट नहीं हो पाये सपा-बसपा और कांग्रेस, ये है बड़ी वजह

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के जरिये सपा-बसपा और कांग्रेस के पास विपक्षी एकता दिखाने का बड़ा मौका था।

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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

Feb 28, 2018

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लखनऊ. लोकसभा चुनाव से पहले गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के जरिये सपा-बसपा और कांग्रेस के पास विपक्षी एकता दिखाने का बड़ा मौका था। लेकिन सपा-बसपा और कांग्रेस ने ऐसी किसी संभावना में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। वजह सबके अपने-अपने सियासी समीकरण थे और हथकंडे थे। उपचुनाव से बसपा पहले ही किनारा कर चुकी है, वहीं सपा और कांग्रेस ने भाजपा से मुकाबले के लिये अपने-अपने प्रत्याशी उतारे हैं।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव बसपा और कांग्रेस से गठबंधन को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर रखे थे। लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं के बाद अखिलेश ने भी साफ कर दिया कि कांग्रसे पार्टी से उनका गठबंधन सिर्फ विधानसभा चुनाव तक ही था। आगे के लिये दोनों की राहें अलग-अलग हैं। वहीं मायावती ने भी समाजवादी पार्टी के साथ आने से इनकार कर दिया है। सपा-बसपा और कांग्रेस का एक मंच पर आना लगभग मुश्किल है, क्योंकि तीनों दल लोकसभा चुनाव से पहले अपने कोर वोटरों तक मजबूत संदेश देना चाहते हैं।

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उपचुनाव में जीत से उत्साहित हैं कांग्रेसी
मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और केरल के उपचुनाव में दमदार प्रदर्शन के बाद कांग्रेस पार्टी और कार्यकर्ता उत्साहित हैं। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि इस बार जनता का झुकाव कांग्रेस पार्टी की ओर है। इसलिये अकेले पार्टी को अकेले दम पर ही चुनाव में जाना चाहिये। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा से गठबंधन के बाद भी पार्टी की करारी हार हुई थी। दिग्गज कांग्रेसियों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी को अकेले दम पर चुनाव लड़ना चाहिये। यही कारण है कि कानपुर देहात में सिकंदरा विधानसभा उपचुनाव और निकाय चुनाव के बाद गोरखपुर और फुलपुर उपचुनाव के लिये अपने प्रत्याशी उतारे हैं।

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बसपा की अपनी वजह
मायावती दलित समाज से आती हैं। सूबे के युवा दलित मतदाताओं को मायावती की मध्यमार्गीय दलित राजनीति पसंद नहीं है। राज्यसभा से बाहर रहकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने कोट वोटर दलितों को बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। वह इसे भुनाने की कोशिश करेंगी कि देश में दलित की बेटी को परेशान किया जा रहा है। राज्यसभा में उन्होंने बोलने नहीं दिया जा रहा है। इसीलिये उन्होंने लालू प्रसाद यादव के सहयोग से राज्यसभा जाना इनकार कर दिया था। मायावती का मानना है कि इसका फायदा उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मिलेगा। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि सपा या कांग्रेस से दूर रहकर ही वह 2007 का इतिहास दोहरा पाएंगी। गौरतलब है कि 2007 में 80 सीटें जीतने वाली बसपा 2017 में मात्र 19 सीटों पर सिमट गई थी।

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अकेले साइकिल दौड़ाने को तैयार समाजवादी पार्टी
समाजवादी पार्टी ने 2019 चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। अखिलेश यादव ने तो कन्नौज से पार्टी का चुनावी अभियान भी शुरू कर दिया है। हाल ही में अखिलेश यादव ने संकेत दिये थे कि वह भाजपा को हटाने के लिये वह मायावती से भी गठबंधन करने को तैयार हैं, लेकिन मायावती के इनकार के बाद समाजवादी पार्टी अकेले ही साइकिल दौड़ाने को तैयार है। कांग्रेस पार्टी से गठबंधन की बातें भी पुरानी हो चुकी हैं। इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि ममता बनर्जी और शरद पवार की तरह अखिलेश यादव भी राहुल गांधी को तीसरे दल के मुखिया के तौर पर नहीं देखते। हालांकि, अभी अखिलेश यादव और कांग्रेसी नेताओं के बीच मुलाकात का दौर जारी है। मंगलवार को भी अखिलेश यादव ने वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं संग करीब एक घंटे की मुलाकात हुई। सियासी सुगबुगाहट बढ़ी तो दोनों पक्षों ने मुलाकात को महज शिष्टाचार भेंट बताया।


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