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दीये और कलश की कीमत में हुई 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी, दीपावली पर्व की तैयारी में जुटे कुम्हार

दीपोत्सव में जगमग रोशनी बिखेरने के लिए कुम्हारपारा में हजारों की तादात में दीये, ग्वालिन व कलश तैयार की जा रही है

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diya

दीये और कलश की कीमत में हुई 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी, दीपावली पर्व की तैयारी में जुटे कुम्हार

महासमुंद. दीपावली पर्व की तैयारी शुरू हो गई है। शहर के कुम्हारपारा के लगभग सभी घरों में इन दिनों कुम्हार मिट्टी के दीये व कलश तैयार करने में जुटे हुए हैं। महंगाई के चलते इस साल दीये व कलश की कीमत में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है।

दीपोत्सव में जगमग रोशनी बिखेरने के लिए कुम्हारपारा में हजारों की तादात में दीये, ग्वालिन व कलश तैयार की जा रही है। महंगाई के चलते इस वर्ष भी मिट्टी, भूंसा, लकड़ी व गेरूए रंग की कीमत बढ़ गई है। कुम्हारों ने बताया कि चायनीज लाइटों व दीए के आने से प्रतिवर्ष नुकसान हो रहा है। कुम्हार पैतृक व्यवसाय को छोड़ नहीं पा रहे हैं। कुम्हारों ने बताया कि त्योहार के मद्देनजर पखवाड़ेभर से पहले ही दीए, कलश व ग्वालिन बनाने का कार्य में चल रहा है। महंगाई के चलते इस साल कीमतों में बढ़ोतरी होगी।

इधर, कुम्हारों को माटीकला बोर्ड द्वारा भी लाभ नहीं मिल रहा है। योजना के तहत मिलने वाली इलेक्ट्रॉनिक चॉक भी महासमुंद के कुम्हारों को नहीं मिला है। जमीन देने का वायदा भी पूरा नहीं हो पाया है। कुम्हार अपने मकान के हिस्सों में ही दिये व मूर्तियों का निर्माण कर बिक्री कर रहे हैं। गर्मी के सीजन में खपरा बनाने का कार्य चलता है, लेकिन शिकायतों के चलते कार्य प्रभावित हो जाता है। इस कारण कुम्हारों की स्थिति खराब है।

कुम्हारों को नहीं मिल रहा है बाजार
शहर के कुम्हारों को एक तरफ योजना का लाभ नहीं मिल रहा है, वहीं इनके लिए पालिका ने बाजार का निर्माण भी नहीं कराया है। कुम्हारों द्वारा पालिका से कई बार स्थाई बाजार की मांग की जा चुकी हैं, लेकिन पालिका बाजार उपलब्ध नहीं करा पा रही है। त्योहार आते ही कुम्हार सडक़ पर मिट्टी से निर्मित सामग्री को बेचने मजबूर हो जाते हैं। दूसरों के घरों को रोशन करने वाले कुम्हारों का जीवन खुद ही अंधेरे में है।

दीपों को बेचने के लिए स्थानीय कुम्हार ही नहीं ओडिशा से बड़ी संख्या में कुम्हार यहां पहुंचते हैं। जो खुद अपना घर द्वार छोडक़र यहां आते हैं। दीपावली तक वे यहीं रहते हैं। झालरों की रोशनी में दीपक की रोशनी फीकी पड़ती जा रही है। माटी कला बोर्ड के तमाम प्रयासों के बाद भी कुम्हारों की स्थिति नहीं सुधर रही है।